Friday, 14 May 2010

कुत्ते की पाती गडकरी के नाम

आदरणीय श्री गड़करीजी.

सादर प्रणाम. आशा है आप प्रसन्न होंगे.

सबसे पहले आपका धन्यवाद कि आपने मेरी प्रजाति के सदस्यों को भारत के महान लोगों के दिलो-दिमाग पर दोबारा ला दिया. वर्ना तो लोग हमें भूल ही चुके थे. आज से पहले टेलीविज़न और अखबारों में हमारा नाम शायद इतनी बार पहले कभी नहीं लिया गया था.

अब हर चैनल पर बार-बार कुत्ता-कुत्ता चल रहा है. एक नहीं दस-दस बार चैनलवाले हमारा नाम ले रहे हैं. जिस चैनल पर देखिए कुत्ता पुराण के नए-नए अध्याय सुनाए जा रहे हैं. कुछ दूसरे जानवरों के नाम भी मनुष्यों के मुँह से सुनने में आए हैं. जैसे शेर, छछूंदर, गधा आदि.

लेकिन इस पत्र के माध्यम से मैं अपनी समस्त प्रजाति की ओर से विरोध दर्ज कराना चाहता हूं. सबसे पहली बात तो ये है कि आपने हमें तलवे चाटने वाला कहा. आपने कहा कि लालू-मुलायम कुत्ते की तरह तलवे चाटने लगे. फिर अपनी सफाई में कह डाला कि आप तो सिर्फ हिंदी का मुहावरा प्रयोग कर रहे थे.

माफ कीजिएगा सर. लेकिन हिंदी में मुहावरा कुत्ते की तरह तलवे चाटना नहीं बल्कि सिर्फ तलवे चाटना है. आपने कुत्ते अपनी ओर से घुसा दिया. शायद आपको लगा होगा कि लोग कुत्ते का नाम सुन कर तालियां बजाएंगे. ऐसा हुआ भी. लेकिन आपने जबरन बखेड़ा खड़ा कर दिया.

लालू-मुलायम की पार्टी ने जबर्दस्त विरोध किया. आपके पुतले जलाए गए. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहन सिंह ने कहा कि आप आरएसएस के स्वयंसेवक हैं. आरएसएस कहता है कि वो भारतीय संस्कारों की शिक्षा देता है. तो ऐसे में आपको क्या संस्कार दिए गए हैं. उन्होंने ये भी पूछा कि झारखंड में शिबू सोरेन से समर्थन वापस लेने का बावजूद अभी तक कौन कुत्ते की तरह उनके तलवे चाट रहा है.

मुझे इस बात पर घोर आपत्ति है कि आपने मनुष्यों का अपमान करने के लिए हमारी प्रजाति का नाम लिया. मुझे लगता है कि इससे उन दो मनुष्यों का नहीं बल्कि हमारी पूरी प्रजाति का अपमान हुआ है क्योंकि हम सबसे वफादार जानवरों में माने जाते हैं. आपको उन प्राणियों से जो भी शिकायत रही हो लेकिन उन्हें अपशब्द कहने के लिए आपको कोई दूसरा जानवर ढूंढना चाहिए था. मैं आपको इस  बारे में कोई सुझाव नहीं दूंगा क्योंकि आप स्वयं दादा कोंडके से प्रभावित हैं. आपका मराठी शब्दकोष अपरिमित है. आप हिंदी और मराठी दोनों के शब्दों में आपस में घालमेल करने में माहिर हैं. लिहाज़ा आपको जो ठीक लगे आप उस जानवर का प्रयोग अपनी शब्दावली में कर सकते हैं. लेकिन सर प्लीज़ हम कुत्तों को बख्श दीजिए.

आपने कहा कि वो हमारी तलवे चाटने लगे. आपको शायद पता नहीं कि हमें जब कोई प्यार से आवाज़ दे तो हम दुम भी हिलाने लगते हैं. इसलिए एक मुहावरा कुत्ते की तरह दुम हिलाना भी है. आप चाहें तो अगली बार इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन मौजूदा संदर्भ में हमारी प्रजाति को घसीटना बेहद आपत्तिजनक है.

वैसे लगता है कि आपको हम कुत्तों से कुछ खासी ही समस्या है. इससे पहले आप अपने भाषणों में ये कहते रहे हैं कि चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तब उन्होंने कुत्तों के बिस्किट पर टैक्स कम कर दिया था. महंगाई पर आपके भाषण में आप इस बात का बार-बार जिक्र करते हैं. अब अगर हम कुत्ते बिस्किट नहीं खाएंगे तो क्या खाएंगे.. आपको क्या समस्या है अगर हम कुत्तों को खाने के लिए बिस्किट कुछ सस्ते दामों पर मिल जाएं.

कृपया कुत्तों को अकेला छोड़ दीजिए. उन्हें राजनीति में मत घसीटिए. क्योंकि वैसे भी पहले से ही कई किस्म के जानवर राजनीति कर रहे हैं. हमें शांति से घरों की चौकीदारी करने दीजिए.

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में

आपका प्रिय
कुत्ता

Friday, 7 May 2010

अब तो लाइन पर आ जाओ

गृह मंत्री पी चिदंबरम ने राज्य सभा में अपने मंत्रालय के कामकाज के बारे में चर्चा के जवाब में कहा गृह मंत्रालय का मतलब सिर्फ नक्सलवाद की समस्या से निबटने वाला मंत्रालय नहीं है. वैसे भी नक्सलवाद पर अलग से चर्चा हो चुकी है लिहाजा उन्होंने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा.

इससे पहले दिन में गृह मंत्रालय की ओर से एक प्रेस नोट जारी हुआ. इसमें नक्सलवादियों के लिए सहानुभूति रखने वाले भोपुओं को आगाह किया गया कि वे लाइन पर आ जाएं. मुट्ठी बाँध कर हवा में लहराने और टेलीविज़न पर आदिवासी-आदिवासी चिल्लाने से कुछ नहीं होगा. इस चेतावनी में कहा गया है कि अगर इन्होंने नक्सलवादियों को अपना मूक और कभी-कभी मुखर समर्थन जारी रखा तो उनके खिलाफ अनलॉफुल एक्टीविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट 1967 के सेक्शन 39 के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है. इसमें अधिकतम दस साल की सजा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है. गृह मंत्रालय के नोट में यह भी कहा गया है कि सीपीआई माओवादी एक आतंकवादी संगठन है. ये बात अलग है कि गृह मंत्रालय की अपनी वेबसाइट पर प्रतिबंधित संगठनों की सूची में अब भी एमसीसी और सीपीआईएमएल का ही नाम है. जबकि इन दोनों संगठनों का 2004 में विलय हो चुका है और अब ये सीपीआईमाओवादी के नाम से अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाते हैं.

कुछ लोगों ने तुरंत ही इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ दिया. इन्होंने पूछा कि क्या अब इस मुल्क में सरकार का ही हुक्म बजाना होगा. जो सरकार कहेगी वही करना होगा. क्या गरीब आदिवासियों की समस्याओं के बारे में बात करना आतंकवादियों का समर्थन करना है. सरकार पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करती है और आदिवासियों का पिछले साठ साल से शोषण किया जा रहा है. सलवा जुड़ूम जैसे असंवैधानिक कदम का समर्थन क्यों करती है सरकार.

कितना खूबसूरत जाल बुनते हैं आतंकवादियों के ये समर्थक. गरीब और मासूम आदिवासियों को आड़ बना कर वैचारिक दृष्टि से अपने करीब माओवादियों के समर्थन में कैसे तर्क गढ़ते हैं. आदिवासियों के शोषण को मुद्दा बना कर बंदूक से अपने ही मुल्क के दूसरे लोगों को मारने को जायज ठहराते हैं ये लोग.

परेशानी मुझे भी है. मुझे ट्रैफिक जाम में फंसने के बाद ट्रैफिक पुलिस वाले से लेकर दिल्ली सरकार पर बहुत गुस्सा आता है फिर ये गुस्सा गृह मंत्रालय तक पहुंच जाता है क्योंकि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के तहत है. मेरे घर पर सात-सात आठ-आठ घंटे बिजली नहीं होती तब भी बहुत गुस्सा आता है. बिजली विभाग से शुरू हो कर मायावती सरकार तक पहुँच जाता है ये गुस्सा और फिर केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय  तक. स्ट्रीट लाइट नहीं जलती है तो नगर निगम के कर्मचारी से लेकर राष्ट्रपति तक पर गुस्सा आता है. मुझे लगता है मैं देश के कानून का पालन करने वाला एक सीधा-साधा नागरिक हूँ. मैं अपने कर सही समय पर जमा करवाता हूँ. फिर मुझे अपने जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी बुनियादी सुविधायें पाने का हक क्यों नहीं है.

क्या मुझे बंदूक उठा लेनी चाहिए. क्या नीचे से लेकर ऊपर तक सरकार के हर कारिंदे को लाइन में खड़ा कर उड़ा देना चाहिए. नहीं. क्योंकि ये मेरी विचारधारा नहीं है. मुझे अपने मुल्क से प्यार है. जो देश चलाते हैं उनसे भी क्योंकि वो एक व्यवस्था का अंग हैं और यह व्यवस्था हमारे बुजुर्गों ने लिखित संविधान के जरिए तय की है. इस व्यवस्था में ढेरों खामियाँ हैं. उनका कोई हिसाब नहीं है. लेकिन इसके लिए दोषी कौन ये बहस करने का वक्त नहीं है. बल्कि इन्हें कैसे दूर किया जाए बात इस पर होनी चाहिए.

लेकिन ये ढोंगी आदिवासियों के हक की बात करते हैं. भोले-भाले आदिवासियों के हक को मारा जा रहा है क्योंकि उनके इलाकों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्लांट्स लगा रही हैं. एमओयू साइन किए जा रहे हैं. आदिवासियों को उनके घरों से बेदखल किया जा रहा है. विकास में आदिवासियों की हिस्सेदारी नहीं है. विकास की रोशनी साठ साल में भी किसी आदिवासी के घर के आंगन में उजाला नहीं भर सकी है. वगैरह वगैरह.

विकास के काम में संतुलन हो अब इतनी समझ तो पिछले साठ साल में हमारे देश के हुक्मरानों को आ चुकी है. वैसे भी अगर जयराम रमेश जैसे लोग पर्यावरण मंत्रालय में बैठे हो तो समझ लेना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा को उजाड़ कर विकास की राह पर बढ़ना कितना कठिन होगा जब तक कि राहत और पुनर्वास का काम पक्के तौर पर न कर लिया जाए. जैसे अभी रमेश ने मध्य प्रदेश के महेश्वर बाँध परियोजना के काम पर रोक लगा दी क्योंकि उन्हें लगता है कि आरएंडआर का कम ठीक से नहीं हुआ है. ये एक नए किस्म का एक्टीविज़्म है जो अब मंत्रियों के जरिए सरकारी कामकाज में भी दिखने लगा है क्योंकि इस बांध का काम करीब 90 फीसदी पूरा हो चुका है.

इसी तरह उड़ीसा में वेदांता के प्रोजेक्ट से उजड़ने वाले आदिवासियों के एक देवस्थल का जिक्र भी एक मशहूर पत्रिका में हुआ है. इस किस्से की तुलना हॉलीवुड फिल्म अवतार से की गई है कैसे आदिवासियों की परंपरा को नष्ट करने के लिए घुसपैठिए आते हैं और आखिर में जीत आदिवासियों की ही होती है.

हक सबका है दोस्तों. आदिवासियों का भी इस देश पर उतना ही हक है जितना आपका या मेरा. लेकिन आदिवासियों के नाम पर बंदूक उठा कर देश के संविधान के खिलाफ काम करने का हक माओवादियों को किसने दिया. दरअसल, आदिवासी तो बहाना हैं. इनका मकसद देश का संविधान पलट कर पीपुल्स आर्मी के जरिए भारत की सत्ता संचालन का सूत्र अपने हाथों में लेना है.

भोपुओं ये तो बता दो. अगर माओवादी सत्ता में आ गए तो क्या भारत में मानवाधिकार आयोग बना रहेगा या नहीं. वैसे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है. तुम्हें तो मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बने रह कर इसी के खिलाफ बोलना है. तुम इसी व्यवस्था से फायदा उठाते हो. और इस व्यवस्था से लड़ रहे आतंकवादियों के हक में भी बोलते हो. लेकिन अब जरा गृह मंत्रालय की तथाकथित सलाह पर भी नजर मार लेना. शायद तुम्हारे हक में अच्छा हो.