Monday, 19 July 2010

खुल गई, खुल गई पत्रकारिता की नई दुकान!

मित्रों,
मुझे यह बताते हुये बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी जानकारी में पत्रकार बनाने की एक नई दुकान आई है. यह दुकान रातों-रात किसी को भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार बना सकती है. दुकानदारों ने मुझे इस संस्था की जानकारी डाक से भेजी थी. मैं आपसे इस जानकारी को बाँटना चाहता हूँ.

चिरकुट मीडिया संस्थान
  •  देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक.
  •  हमारे यहाँ रातों-रात पत्रकार बनाने की गारंटी दी जाती है.
  •  संस्थान में भर्ती होने के लिये किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं.
  • अगर संभव हो तो अपना या फिर अपने माता-पिता का पिछले तीन साल का आयकर रिटर्न, बैंक अकाउंट, क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट जमा करायें.  अगर आपके माता-पिता की आमदनी एक लाख रुपये से कम है तो कृपया हमारे संस्थान के लिये एप्लाई न करें.
  • अपना पुलिस रिकॉर्ड ज़रूर दें. ध्यान रहे अगर आप पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं तो आपका चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती होना बिल्कुल तय माना जायेगा.
  • अपने दोस्तों, सहयोगियों से एक चरित्र प्रमाणपत्र ले कर आयें. ये ज़रूर लिखवायें कि वो आपको चमचई की कला में निपुण मानते हैं या नहीं. अगर हाँ, तो समझिये चिरकुट मीडिया संस्थान आपके लिये ही बना है.
  • संस्थान में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा होगी.
  • इसकी तैयारी के लिए आपसे यह अपेक्षा है कि आप सत्य कथा, कच्ची कलियां, बेशर्म आबरू, मैं सबका बाप- मेरा कोई बेटा नहीं, नाजुक जवानी, सच्ची कहानियां और फुटपाथ पर मिलने वाली दूसरी इसी तरह की उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिकाओं का गहन अध्ययन करें. ध्यान रहे आपके कुछ मित्र आपको यह कह कर बहका सकते हैं कि ये बाजारू पत्रिकायें हैं. लेकिन आप बहकावे में न आयें. आज की टीवी पत्रकारिता की असली कसौटी यही है कि आप इन पत्रिकाओं से कितना ज्ञान आत्मसात कर सकते हैं.
  • इन साहित्यिक पत्रिकाओं की लेखन शैली और खासतौर से शीर्षकों पर खास ध्यान दें. जैसे मैंने अपना ही खून किया, मेरी बीवी को वो ले भागा, मेरा दोस्त बना मेरी सौतन, स्वर्ग यहां, नर्क पड़ोसी के वहां, ये किसकी औलाद, बेटा बना बाप का बाप आदि. याद रहे चिरकुट मीडिया संस्थान में इस तरह के अनोखे, बिल्कुल अलग तरह के और समाज से सरोकार रखने वाले शीर्षक देने वालों को वरीयता दी जाएगी.
  • फिल्मी पत्रिकाओं का भी रट्टा लगा लें. ध्यान रहे प्रवेश परीक्षा में नकल करने की अनुमति नहीं है. इसलिए यह जरूर पता कर लें कि धोनी की शादी होने का बाद अब दीपिका पादुकोण किसके साथ पींगे लड़ा रही हैं, बिपाशा बसु के अंग वस्त्रों की साइज़ क्या है, वो जो चुंबन करते हुए दृश्य छपा है, उसमें हीरो-हीरोइन कौन हैं वगैरह. ध्यान रहे न सिर्फ चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती के लिए ये सब जानकारी आपके लिए अति आवश्यक है बल्कि संस्थान से निकलने के बाद जब देश के प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों में जाएँगे तब वहां की प्रवेश परीक्षाओं में भी आपसे यही सारे सवाल पूछे जाएँगे.
  • चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती के लिए एक अहम आवश्यकता है - विज्ञान का ज्ञान. आपसे यह अपेक्षित है कि आप उड़नतश्तरियों के मूवमेंट पर नज़र रखें. आपके इलाके में कौन सी गाय या भैंस को एलीयंस उठा कर ले गए थे. उस घटना के बाद से उनके दूध देने की क्षमता में क्या तब्दीली आई.  क्या एलीयंस ने आपके किसी जान-पहचान वाले के साथ यौन दुराचार तो नहीं किया है. आपके इलाके या उसके आसपास कौन सा पेड़ है जो दूध पीकर खून उगलने की ताकत रखता है आदि.
  • आपसे यह भी अपेक्षित है कि आपकी धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र में न सिर्फ आस्था हो बल्कि उनका गहन ज्ञान भी हो. स्वर्ग की सीढ़ियां कहां से जाती हैं इस प्रश्न का उत्तर आपके जुबां पर हमेशा रहना चाहिए. कौन सा बाबा किस कन्या की इज्जत लूट रहा है. अगर शनि शुक्र में घुस जाए और उसके सिर पर राहु-केतु डिस्को करें तो जातक के भविष्य पर क्या असर होगा, ये सामान्य ज्ञान आपसे अपेक्षित है.
  • क्रिकेट को आप पूरी तरह से चाट लें. डरिए मत. आपसे ये नहीं पूछा जाए कि फील्डिंग पोजीशन क्या होती है या फिर गुगली या दूसरा क्या बला है. लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि किस क्रिकेटर का किस हीरोइन के साथ टांका भिड़ा है, कौन सा क्रिकेटर मैच फिक्सिंग में फंसा है, या कल रात नाइट क्लब में किस क्रिकेटर ने टल्ली होकर अपने दोस्त की बीवी के गालों पर चुम्मी ले ली थी.
हर प्रवेश परीक्षा के कोचिंग संस्थान की तरह हमारा भी यह फर्ज है कि हम अपने यहां प्रवेश लेने के इच्छुक नौजवानों की मदद करें. चिरकुट मीडिया संस्थान की प्रवेश परीक्षा में सफल होने के लिये कोई गाइड या कुंजी उपलब्ध नहीं है. अगर कोई बाजार में ऐसा कहता है तो ऐसे फर्जी लोगों से सावधान रहें.  लेकिन चूंकि आपने हमारे संस्थान में प्रवेश लेने में दिलचस्पी दिखाई है इसलिए हम आपको बता रहे हैं कि आप प्रवेश परीक्षा की तैयारी कैसे करें.

हर सप्ताह कुछ अखबारों में न्यूज चैनलों का टीआरपी चार्ट छपता है. आप उनमें से कुछ आला चैनलों का चुनाव करें. अगले एक महीने तक इन चैनलों को देखने का बीड़ा उठाएँ. हम पक्के तौर पर आपसे वादा करते हैं कि हमने ऊपर जिन भी विषयों का जिक्र किया है वे सब आपको इन चैनलों में देखने को मिल जाएँगे. तो बस हो गई तैयारी पूरी.

बस तो अब देर किस बात की है. हो जाइए शुरू. चिरकुट मीडिया संस्थान आपका स्वागत करता है. ध्यान रहे आप आज हमारे काम आएँगे कल हम आपके काम आएंगे.

Saturday, 17 July 2010

हो गई बात!!!

बड़ी धूम धाम से हमारे विदेश मंत्री पाकिस्तान गए थे.
अमन की आशा में.
मुंबई के ज़ख्म अब भी हरे हैं.
पाकिस्तान ने मुंबई के गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उल्टे वो समय-समय पर सबूत मांगता रहता है.
फिर भी, सैम अंकल के कहने पर हमारी सरकार हर बार घुटने टेकती है. हर बार बातचीत की पहल करती है.
अब हो गई तसल्ली. कैसे-कैसे झूठ बोले पाकिस्तान ने. जैसे बातचीत को सार्थक और सफल बनाने का जिम्मा सिर्फ भारत का है पाकिस्तान की शर्तों पर ही होगी बातचीत.
क्या बहाना बनाया है. कहा कृष्णा इस्लामाबाद में जितने वक्त रहे, पूरे वक्त भारत में अपने हुक्मरानों से फोन पर बतियाते रहे कि क्या करना है, क्या कहना है वगैरह-वगैरह.
शुक्र है, कुरैशी ने ये नहीं कहा कि कृष्णा नई दिल्ली के साथ-साथ वॉशिंगटन से भी फोन पर निर्देश लेते रहे. वो शायद इसलिए नहीं कहा क्योंकि वॉशिंगटन की लाइन व्यस्त रही होगी उनके फोन से. बीच-बीच में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के मिस्ड कॉल भी आते रहे होंगे. इन्हीं मिस्ड कॉल में से किसी एक का जवाब दिया होगा तो सेना ने बोला होगा बहुत हो गई बातचीत. सुना नहीं गृह सचिव जी के पिल्लई ने क्या कहा है. वो कहते हैं मुंबई हमलों के पीछे आईएसआई का हाथ है. फिर भी, बात कर रहे हो विदेश मंत्री से... छोड़ो ये बातचीत और उन्हें खाली हाथ दिल्ली रवाना करो.
यहां दिल्ली में तो लोग बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे थे. अमन की आशा में बड़ी-बड़ी बातें भी हो गईं. हर बार बातचीत शुरू होने पर इ्न्हें लगता है बस साठ साल का रंजिश भरा इतिहास अब दफ्न हो चुका है. अब तो अमन की नई इबारत लिखी जानी है. इस बार तो पक्का ही पाकिस्तान अपना रवैया बदल देगा. रही बात भारत की.... तो वो तो हम वाघा बॉर्डर पर इतनी मोमबत्तियां जलाएंगे कि उनकी लौ की आँच दिल्ली की कुर्सी तक पहुँच जाएगी. आखिर यही हमारा दबाव तो है असली वजह. जिसके चलते बार-बार दुत्कारे जाने के बाद भी भारत हर बार शांति का हाथ बढ़ा कर पहुँच जाता है इस्लामाबाद.

मुंबई हमले के गुनहगारों को पूरी पनाह दो. कश्मीर में पत्थर फेंको गैंग को पूरा समर्थन दो. माओवादियों को भी असला-बारूद पहुँचाओ. फिर हमारी कनपटी पर पिस्तौल लगा कर कहो चलो करो बातचीत... हर बार की तरह पहले कश्मीर और बलूचिस्तान पर कर लो बात.. आतंकवाद-आतंकवाद क्या होता है. हम भी तो हैं आतंकवाद को भुक्तभोगी. ये है पाकिस्तान का रवैया.

तो हमारी क्या मति मारी गई है. क्यों बार-बार पहुँच जाते हैं हमारी सरकार के आला लोग पाकिस्तान. देख लो चिदंबरम भी तो गए थे. लेकिन उनका विवेक शायद फिर भी ठीक रहा. दो टूक सुना आए पाकिस्तान को. कृष्णा के सामने भी कुरैशी की बकवास के बाद ज्यादा विकल्प नहीं बचे. वर्ना तो शायद फिर से कोई साझा बयान जारी कर देते बलूचिस्तान के ज़िक्र वाला जैसे शर्म अल शेख में करवाया था.

तो कब तक करेंगे हम ये अमन की पहल. क्या इस इलाके में शांति बनाए रखने का ठेका भारत ने ही ले रखा है. क्यों हम कमजोर दिखते हैं. अगर पाकिस्तान जैसे पिद्दी से मुल्क के सामने हमारी हवा खिसकती है तो किस बूते पर हम दुनिया का सरताज बनने का सपना पाल रहे हैं.

दस साल सोच कर देखो कि पाकिस्तान नाम का मुल्क इस दुनिया में है ही नहीं. सब बंद कर दो. बातचीत भी. और ज़रा पूरब की तरफ नज़र उठा कर देखो जहाँ बैठा है असली चुनौती देने वाला. सारी नीतियां चीन के बारे में हों, दोस्ती हो दोस्ती, दुश्मनी हो तो दुश्मनी.. लेकिन असली खेल वहीं से शुरू होगा.. या शायद हो भी चुका है.