Friday, 23 May 2014

मोदी से सहयोगी दलों की आस


बीजेपी को लोक सभा में अपने बूते पर बहुमत है। जबकि सहयोगियों के साथ उसकी संख्या 336 है। बीजेपी के अलावा एनडीए की ऐसी ग्यारह पार्टियां और हैं जिन्होंने लोक सभा में सीटें जीती हैं। इनमें शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी की संख्या दहाई में है। अब जबकि मंत्रिमंडल के गठन के लिए माथा-पच्ची शुरू हो गई है, सवाल है कितने सहयोगी दलों को मोदी सरकार में जगह मिलेगी और मंत्रिमंडल में उनकी कितनी हिस्सेदारी होगी।

मोदी सरकार में सहयोगी दलों को शामिल करने पर बातचीत का सिलसिला जल्दी ही शुरू होगा। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी के सभी सहयोगी दलों को मोदी सरकार में जगह मिलने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने के लिए 26 मई को दिल्ली आएंगे। अगर 26 को शपथ ग्रहण में सहयोगियों को भी शामिल करने का फैसला होता है तो इससे पहले उनसे बात हो सकती है।

जबकि तेलुगुदेशम पार्टी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू कल दिल्ली आ रहे हैं। वो मोदी से मिलेंगे। टीडीपी को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक गणपति राजू का नाम आगे है। बिहार में मध्यावधि चुनावों की संभावना के मद्देनज़र राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को हिस्सेदारी मिल सकती है। जबकि उत्तर प्रदेश से अपना दल की अनुप्रिया पटेल को भी बतौर राज्य मंत्री सरकार में लिया जा सकता है। अकाली दल एकमात्र ऐसा सहयोगी दल है जिसने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया है। हालांकि बीजेपी उसे सरकार में शामिल होने का न्योता दे सकती है।

बीजेपी नेताओं के मुताबिक सहयोगी दलों को मंत्रिमंडल में जगह देने के लिए एक फार्मूले पर काम किया जा रहा है। इस फार्मूले से हर सहयोगी दल के न सिर्फ कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की संख्या तय की जा रही है बल्कि ये भी तय हो रहा है कि किस पार्टी के कितने मंत्री बनाए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक अभी तक के फार्मूले के मुताबिक लोक सभा के तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री मिल सकता है। अगर मंत्रिमंडल का आकार छोटा कर सिर्फ पचास का रखा जाएगा तो हर सात सांसदों पर एक मंत्री बनेगा। जबकि सत्तर के मंत्रिमंडल पर यह संख्या पांच हो सकती है।

अगर मोदी मंत्रिमंडल सिर्फ पचास का रहता है तो देखा जाए कि किस पार्टी को कितना हिस्सा मिलेगा। तेलुगु देशम पार्टी को लोक सभा में 16 सीटें मिली हैं। इस लिहाज़ से उसका एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री बनता है। जबकि 18 सीटें हासिल करने वाली शिवसेना को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। वैसे वाजपेयी सरकार में शिवसेना को ज्यादा हिस्सेदारी दी गई थी। लेकिन तब बीजेपी की सीटें 182 थीं। अब जबकि बीजेपी के पास 282 सीटें हैं, सहयोगी दलों की हिस्सेदारी अपने-आप कम हो जाएगी।

इस फार्मूले के मुताबिक सहयोगी दलों में शिवसेना और टीडीपी को छोड़ किसी अन्य दल के सांसद को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। अन्य सहयोगी दलों में लोक जनशक्ति पार्टी को छह, अकाली दल को चार, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को तीन, अपना दल को दो सीटें मिली हैं। जबकि नगा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीएमके, स्वाभिमानी पक्ष और ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को एक-एक सीटें मिली हैं।

इस तरह मोदी को ये तय करना होगा कि लोक सभा में संख्या बल कम होने के बावजूद क्या सहयोगी पार्टियों को क्षेत्रीय संतुलन और उनके नेताओं के कद के हिसाब से मंत्रिमंडल में जगह मिलनी चाहिए। मिसाल के तौर पर तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री के फार्मूले के मुताबिक छह सांसदों वाले राम विलास पासवान को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। लेकिन बिहार में संभावित मध्यावधि चुनाव, पासवान वोटों से मिली बीजेपी को शानदार कामयाबी और पासवान के अनुभव और वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। मोदी ने दलित एजेंडे पर खास ध्यान दिया है ऐसे में पासवान के दावे को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होगा।

इसी तरह से नागालैंड में 2003 से सत्तारूढ़ नगा पीपुल्स फ्रंट के दावे को दरकिनार करना मुश्किल होगा। जबकि नेशनल पीपुल्स पार्टी से पूर्व लोक सभा अध्यक्ष पी ए संगमा जीत कर आए हैं। उत्तर-पूर्व को प्रतिनिधित्व देने के लिए इन नेताओं की दावेदारी भी बनती है। तमिलनाडु से बीजेपी के अपने एक सांसद हैं जबकि पीएमके ने भी एक सीट जीती है। जबकि बगल के पुड्डुचेरी से भी बीजेपी के सहयोगी दल ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को कामयाबी मिली है। इसीलिए क्षेत्रीय संतुलन बिठाने के लिए ऊपर दिए फार्मूले को नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता है।




Thursday, 22 May 2014

कसी सरकार की कवायद


नरेंद्र मोदी 26 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। लेकिन उन्होंने काम पहले ही शुरू कर दिया है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है जब किसी नेता ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने और राष्ट्रपति से सरकार बनाने के लिए निमंत्रण मिलने से पहले ही काम शुरू कर दिया हो। मोदी कैबिनेट सचिव और गृह सचिव से मिल चुके हैं। खबरों के मुताबिक उन्होंने इन दोनों ही आला अफसरों को कई महत्वपूर्ण काम करने के लिए कह दिया था। इसी तरह सरकार के गठन के लेकर भी उन्होंने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की है।

माना जा रहा है कि मोदी सरकार देश के इतिहास की सबसे कसी हुई सरकार होगी। एक ऐसी सरकार जिसे न तो गठबंधन की मजबूरियों के नाम पर मनमाफिक मंत्रालय लेने के सहयोगी दलों के दबाव के आगे झुकने की मजबूरी है और न ही पार्टी के अंदरूनी समीकरणों में संतुलन बिठाने के लिए बुजुर्ग नेताओं को एडजस्ट करने का दबाव झेलना है। पचहत्तर पार कर चुके नेताओं के लिए राजभवनों के दरवाजे खोलने की तैयारी है। खुद मोदी 63 साल के हैं और उनकी सरकार में एक-दो अपवादों को छोड़ उम्र में उनसे बड़ा कोई नेता शायद ही मंत्री बनाया जाए।

सरकारी खर्चों में कटौती करने और काम में दक्षता और कुशलता बढ़ाने के लिए मंत्रालयों में कांट-छांट और उन्हें आपस में मिलाने की सबसे बड़ी कवायद की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार के संभावित स्वरूप को लेकर कई महीनों से तैयारियां चल रही हैं। कई विकसित देशों की सरकारों के मॉडल का अध्ययन किया गया और एक मोटी रिपोर्ट तैयार की गई है। इसी रिपोर्ट के आधार पर चर्चा चल रही है कि कई गैरज़रूरी मंत्रालयों को खत्म किया जाएगा। कई मंत्रालयों को आपस में मिला दिया जाएगा और कई मंत्रालयों को निगमों में तबदील कर दिया जाएगा।

मिसाल के तौर पर गृह मंत्रालय से आंतरिक सुरक्षा को अलग करने का प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव के तहत एक राज्य मंत्री को आंतरिक सुरक्षा का प्रभार देकर उसे सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन कर दिया जाएगा। मोदी सीधे-सीधे आईबी और एनआईए जैसी एजेंसियों के रोज़मर्रा के कामकाज पर नज़र रख सकेंगे। इसी तरह एक नया इंफ्रास्ट्रक्चर मंत्रालय बनाने का प्रस्ताव है। जिसमें भूतल परिवहन और जहाजरानी जैसे कई अन्य मंत्रालय मिलाए जा सकते हैं। इसमें रेल मंत्रालय को भी मिला कर यातायात मंत्रालय बनाने का भी प्रस्ताव था। लेकिन रेल मंत्रालय के भारी आकार को देखते हुए फिलहाल इसे अलग ही रखने का विचार है।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, ऊर्जा, कोयला और गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जैसे अलग-अलग मंत्रालयों को मिला कर ऊर्जा मंत्रालय बनाया जा सकता है। जबकि ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालयों को एक किया जा सकता है। इसी तरह उद्योग, वाणिज्य, कपड़ा व सूक्ष्म, लघु व मंझले उद्यम मंत्रालयों को मिला कर एक भारी-भरकम मंत्रालय बनाने का प्रस्ताव है। कृषि, खाद्य, खाद्य प्रसंस्करण, नागरिक उपभोक्ता और आपूर्ति मंत्रालयों को भी आपस में मिलाने की योजना है। एक प्रस्ताव ये भी है कि दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना-प्रसारण मंत्रालयों को मिला कर एक नया मंत्रालय बनाया जाए। इसके पीछे सोच ये है कि जब क्षेत्र एक ही है तो उसे अलग-अलग विभागों में क्यों बांटा जाए।

कई गैर ज़रूरी मंत्रालयों को खत्म करने का भी प्रस्ताव है। ओवरसीज़ इंडियन जैसे मंत्रालयों की ज़रूरत महसूस नहीं की जा रही है। एक प्रस्ताव ये भी है कि कई मंत्रालयों को निगमों में तबदील कर दिया जाए और उनकी ज़िम्मेदारी टैक्नोक्रेट को दे दी जाए। इस तरह छह महीने के भीतर राज्य सभा या लोक सभा से चुन कर लाने के झंझट से बचा जा सकेगा। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को भी आगे जा कर निगम में बदला जा सकता है। जबकि नदियों को जोड़ने या उन्हें साफ करने के लिए एक अलग मंत्रालय या निगम बनाने का भी प्रस्ताव है।

दरअसल, मंत्रालयों को बांट कर अलग-अलग पोर्टफोलियो बनाने की कवायद गठबंधन की राजनीति और वरिष्ठ नेताओं को खुश करने की रणनीति के तहत 90 के दशक में बनी अस्थिर सरकारों के दौर से शुरू हुई थी। किसी को अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि चौरासी के बाद एक ऐसी स्थिर सरकार बनने जा रही है जो न सिर्फ एक ही पार्टी की है बल्कि उसे सहयोगी दलों के ब्लैक मेल के आगे भी नहीं झुकना है। मोदी के सामने कोई मजबूरी नहीं है कि रेल या रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय किसी सहयोगी दल को खुश रखने के लिए दे दिए जाएं जैसा कि वाजपेयी सरकार के वक्त हुआ था। वैसे भी कहा जाता है कि गठबंधन राजनीति का सबसे बड़ा शिकार कोई मंत्रालय अगर हुआ है तो वह रेल मंत्रालय ही है।


कुल मिलाकर इसी पूरी कवायद को भूतो न भविष्यति के अंदाज़ में अंजाम दिया जा रहा है। मोदी मीन्स बिज़नेस के मंत्र के साथ आने वाले पाँच साल में काम का खाका तैयार किया जा रहा है। एक ऐसी सरकार की नींव रखी जा रही है जो 21वीं सदी में भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने के रास्ते पर मजबूती और तीव्र गति से लेकर जाए। इसीलिए कहा जा रहा है कि 26 तारीख को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से बीजेपी और सहयोगी दलों के कई नेताओं के चेहरे अगर लटके नज़र आएं तो हैरानी नहीं होगी।

Thursday, 15 May 2014

मोदी सरकार पर माथापच्ची


गांधीनगर से कल आईं तस्वीरें संभावित मोदी सरकार की रूपरेखा को बयान कर रही हैं। राजनाथ सिंह और अरुण जेटली सोफे की सिंगल सीट पर बैठे हैं। नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी डबल सीट वाले सोफे पर। जेटली के दाएं हाथ की तरफ एक फाइल रखी दिख रही है। ऐसी ही एक फाइल मोदी के बगल में रखी है। सामने की सेंटर टेबल पर मोदी, राजनाथ और जेटली के आगे नोट्स लेने के लिए डायरी और कलम रखे दिख रहे हैं। जबकि गडकरी के सामने पीले रंग के दो लिफाफे एक के ऊपर एक रखे हैं। ऊपर वाला खुला है। साइड टेबल पर गुलदस्ता रखा है जिसे शायद थोड़ी देर पहले मोदी को दिया गया होगा।

इन तस्वीरों में सुषमा स्वराज को भी होना था। लेकिन उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र में जाना था। लिहाज़ा इस बैठक से पहले दिल्ली में ही राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने उनसे मुलाकात कर ली थी। सुषमा को मिला कर मोदी, जेटली, राजनाथ सिंह और गडकरी, अगर इन्हें अगली मोदी सरकार का कोर ग्रुप कहें तो ज़्यादा सही होगा। अगर इन तस्वीरों का मिलान दस साल पहले लोक सभा चुनाव के नतीजे आने के पहले सात रेसकोर्स रोड पर तब हुई बैठक की तस्वीरों से करें, तो बदली बीजेपी साफ दिखाई देगी। तब की तस्वीरों में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाल कृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी और प्रमोद महाजन दिखेंगे।  

दस साल में यमुना में काफी पानी बह गया। बीजेपी भी बदल गई है। बल्कि बीजेपी में पिछले दस साल में जितना बदलाव नहीं हुआ होगा उतना 16 मई के बाद से होगा। इस बदलाव की नींव पिछले साल 13 सितंबर को रख दी गई थी जब बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। उसके बाद से जिस मेहनत, लगन और प्रतिबद्धता के साथ मोदी ने पूरे देश में पार्टी का झंडा बुलंद किया है उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है। इस लोक सभा चुनाव में सिर्फ एक ही मुद्दा था नरेंद्र मोदी। और अगर बीजेपी को जीत मिलती है तो इसका सेहरा भी सिर्फ उन्हीं के सिर बंधेगा।

पर अब अगर सरकार बननी है तो ज़ाहिर है सब को साथ लेकर काम करना होगा। मंत्रिमंडल में किसी रखना है और किसे नहीं, ये प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है। बीजेपी यूपीए पर सत्ता के दो केंद्र होने के आरोप लगाती रही है और कहती रही है कि सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा को कम किया। ऐसे में इस बात की अटकल लगाना कि मोदी पर बीजेपी या आरएसएस के वरिष्ठ नेता अपनी पसंद थोप सकते हैं, मुमकिन नहीं लगता। ये याद रखना जरूरी है कि आरएसएस के इनकार करने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने जसवंत सिंह को वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी थी।

लेकिन मोदी के लिए लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं के लिए भूमिका तय करना टेढ़ी खीर साबित होगा। आरएसएस चाहता था कि ये दोनों ही नेता लोक सभा का चुनाव लड़ने के बजाए राज्य सभा में जाएं। लेकिन दोनों ने इससे साफ इनकार कर दिया। बल्कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से भी ये दोनों नेता खुश नहीं थे। आडवाणी ज़्यादा नाराज़ थे कि उनके रहते हुए किसी और को पीएम उम्मीदवार कैसे बनाया जा सकता है।

अब फिर वही सवाल सामने आया है। क्या आडवाणी और जोशी इसलिए चुनाव लड़े कि वो मोदी सरकार में मंत्री बनना चाहते थे? अगर नहीं, तो फिर संभावित सरकार में उनकी क्या भूमिका होगी। आडवाणी के करीबी इशारा कर चुके हैं कि आडवाणी मोदी सरकार में शामिल नहीं होना चाहते मगर लोक सभा अध्यक्ष जैसा संवैधानिक पद लेने से उन्हें गुरेज नहीं। वहीं ये तय है कि जोशी भी सरकार में नहीं रहेंगे।

आडवाणी को लेकर एक दुविधा ये भी है कि फिलहाल वो एनडीए के कार्यकारी अध्यक्ष और बीजेपी संसदीय दल के अध्यक्ष भी हैं। जब तक बीजेपी विपक्ष में थी और ये तय नहीं था कि पार्टी में शीर्षस्थ नेता कौन है, तब तक आडवाणी का इन दोनों पदों पर रहना कोई दिक्कत पैदा नहीं करता था। लेकिन अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं और आडवाणी इन दोनों पदों पर बने रहते हैं तो फिर से मोदी के अधिकारों पर चुनौती उठने का खतरा बरकरार रहेगा। खासकर तब जबकि मोदी को लेकर आडवाणी समय-समय पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते रहे हैं। बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एनडीए के अध्यक्ष थे और संसदीय दल के नेता भी। कोई कारण नहीं है कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये दोनों पद न मिलें। जबकि स्पीकर जैसे संवैधानिक पद पर काबिज होने के बाद आडवाणी सरकार और पार्टी के अंदरूनी कामकाज में न तो कोई दखल दे पाएंगे और न ही ऐसा करना उस संवैधानिक पद की गरिमा के अनुकूल होगा।

स्पीकर का पद भी बेहद संवेदनशील होता है। खासकर गठबंधन की सरकार में। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सिर्फ एक वोट से गिरी थी। तब टीडीपी के जीएमसी बालयोगी स्पीकर थे और उन्होंने उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गमांग को वोट देने की इजाज़त दे दी थी। राजनीति में आडवाणी ने पहला पद स्पीकर का ही लिया था। दिल्ली की मेट्रोपोलिटन कौंसिल में। अब अपने कैरियर के अंतिम पड़ाव पर भी वो यही पद चाहते हैं। पर इस बार लोक सभा का। देखना होगा पार्टी क्या फैसला करती है।


Tuesday, 13 May 2014

कैसी होगी मोदी सरकार?

वोटों की गिनती १६ मई को सुबह शुरू होगी और दोपहर तक तस्वीर साफ हो जाएगी कि किसकी सरकार बनेगी। अगर जनमत सर्वेक्षणों और एक्ज़िट पोल के रूझान परिणाम में बदलते हैं तो नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए सरकार बन सकती है। सवाल ये है कि किस तरह की होगी ये सरकार और मोदी के मंत्रिमंडल में कौन-कौन शामिल हो सकता है और किसे कौन सा मंत्रिमंडल मिल सकता है? 

इसके लिए मोदी के काम करने के तरीक़े को देखना होगा। गुजरात में वो २००१ से मुख्यमंत्री हैं। सत्ता संचालन के सारे सूत्र उनके हाथ में हैं। वो राज्य के सर्वेसर्वा हैं। पार्टी संगठन की चाबी भी उन्हीं के पास है। प्रदेश अध्यक्ष और आरएसएस से आने वाले संगठन मंत्री की तैनाती में उनकी पसंद का ख़ास ध्यान रखा जाता है। मंत्रियों की जवाबदेही वो तय करते हैं। परफार्मेंस आडिट होता है। अफ़सरों और टेक्नोक्रेट के ज़रिए ज़्यादा चलती है सरकार।

संभावना है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने पर गृह मंत्रालय अपने पास ही रखें और भरोसे के राज्य मंत्रियों के सहारे देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक, ये मंत्रालय चलाएँ। ये संभवतः अपने-आप में अनूठा प्रयोग होगा। अमूमन गृह मंत्री को प्रधानमंत्री के बाद सरकार में नंबर दो माना जाता है। लेकिन ऐसा करके मोदी ये बहस ही खत्म कर सकते हैं। 

सिर्फ गृह मंत्रालय ही नहीं, संभावना ये भी है कि मोदी इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण भूतल परिवहन और जहाज़रानी जैसे मंत्रालय भी सीधे अपने पास ही रखें। ऐसा करके निवेश और रोज़गार सृजन के लिहाज़ से अति महत्वपूर्ण इन मंत्रालयों में वो कामकाज में तेज़ गति ला सकते हैं। 

रायसीना हिल या टीले पर नार्थ ब्लाक और साउथ ब्लाक में चार महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं। गृह, वित्त, विदेश और रक्षा। मोदी के भरोसेमंद अरुण जेटली वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी संभाल सकते हैं। जबकि सुषमा स्वराज को विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है। मोदी की कोशिश होगी कि राजनाथ सिंह सरकार में आएँ। हालाँकि वो इससे इनकार कर चुके हैं। उनके राज़ी होने पर उन्हें रक्षा मंत्रालय दिया जा सकता है। किसी भी सहयोगी पार्टी को इनमें से कोई भी महत्वपूर्ण मंत्रालय मिलने की संभावना न के बराबर है। आरएसएस साफ़ कर चुका है महत्वपूर्ण मंत्रालय बीजेपी के पास ही रहने चाहिएं। ग़ौरतलब है कि वाजपेयी सरकार में जार्ज फ़र्नांडिस रक्षा मंत्रालय संभालते थे। 

पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं जैसे वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी, रविशंकर प्रसाद आदि का सरकार में शामिल होना तय माना जा रहा है। हालाँकि गडकरी पार्टी अध्यक्ष बनने के इच्छुक हैं। बड़ी संख्या में पार्टी संगठन से वरिष्ठ नेता सरकार में जाएँगे। पार्टी महासचिव अनंत कुमार, धर्मेंद्र प्रधान, राजीव प्रताप रूड़ी, जगत प्रकाश नड्डा, थावरचंद गहलोत मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए जा सकते हैं। अरुण शौरी की वापसी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

बीजेपी के सहयोगी दलों को भी मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी। शिवसेना, अकाली दल और लोक जनशक्ति पार्टी के नेताओं को कई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकते हैं। शिवसेना के नेता सुरेश प्रभु को भी बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है। कुल मिला कर मोदी की कोशिश होगी कि मंत्रिमंडल बहुत बड़ा न हो। 

फिर भी लाल कृष्ण आडवाणी की भूमिका को लेकर सवाल बचा रह जाता है। ये संभावना न के बराबर है कि वो मंत्री बनेंगे। अधिक संभावना ये भी है कि वो एनडीए के कार्यकारी अध्यक्ष के अपने पद पर बने रहें। जबकि मुरली मनोहर जोशी अगर सरकार में शामिल होने से इनकार करते हैं तो उन्हें स्पीकर की ज़िम्मेदारी भी दी जा सकती है। 

ज़ाहिर ये सब सिर्फ सम्भावनाएँ ही हैं। बीजेपी में अभी इस बारे में प्राथमिक स्तर पर भी चर्चाएँ भी शुरू नहीं हुई हैं क्योंकि तमाम नेताओं की पूरी ऊर्जा चुनाव प्रचार में ही लगी हुई थी। लेकिन १२ मई के बाद से नतीजे आने तक पार्टी में ये चर्चाएँ ज़रूर शुरू हो जाएंगी। ज़ाहिर है सब कुछ १६ मई को आने वाले नतीजों पर ही निर्भर करेगा। तब तक शपथ के लिए शेरवानियां सिलाने का आर्डर तो कई नेता दे ही सकते हैं। 

Monday, 12 May 2014

चुनाव प्रक्रिया पर उठते सवाल

बनारस के अर्दली बाज़ार के मतदान केंद्र पर उषाजी से मुलाक़ात हो गई। हाथ में मतदाता पहचान पत्र लिए मत देने के लिए भटक रही थीं। साथ में उनके पति थे जिन्होंने वोट डाल दिया था। उषा वोट नहीं डाल पाईं क्योंकि उनका नाम मतदाता सूची में विलोपित श्रेणी में रख दिया गया। फ़ार्म ७ के ज़रिए घोषणा कर वोट डलवाया जा सकता था, मगर उन्हें वो फ़ार्म भी नहीं मिल सका।

उषा उन हज़ारों-लाखों मतदाताओं में से एक हैं जो चिलचिलाती धूप में लोकतंत्र को मज़बूत करने वोट डालने के लिए घर से निकलते हैं। मगर ये कई अड़चनों के चलते वोट नहीं डाल पाते और इधर-उधर धक्के खाते हैं। मुंबई और पुणे में लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से नदारद थे। चुनाव आयोग ने इसके लिए माफ़ी मांग कर ख़ुद को ज़िम्मेदारी से बरी कर लिया। सैंकड़ों बूथों पर भारी गड़बड़ियों की शिकायतें आती हैं मगर इक्का-दुक्का केंद्रों पर दोबारा मतदान कर आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है।

दरअसल, दशकों से चुनाव कराते रहने के बावजूद हमारी निर्वाचन प्रणाली न तो नौकरशाही की शिकंजे से निकल सकी है और न ही पीपुल फ्रेंडली हो सकी है। ये प्रक्रिया इतनी जटिल है कि अधिकांश लोग वोट डालने को अब भी झंझट और सिरदर्द ही मानते हैं। ऊपर से चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रमों को लंबा करके इस पूरी प्रक्रिया को अधिक थकाऊ, उबाऊ और खर्चीला बनाता जा रहा है।

जबकि इसका ठीक उल्टा होना चाहिए था।  तकनीक का इस्तेमाल आज जिस बड़े पैमाने पर चुनाव कराने में इस्तेमाल हो रहा है वैसी पहले लोक सभा चुनाव के वक़्त कल्पना भी नहीं हो सकती थी। ईवीएम के इस्तेमाल से काग़ज़ का उपयोग तो कम हुआ ही, मतगणना में भी अधिक पारदर्शिता आई है। मतदान केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरों और कंप्यूटरों के इस्तेमाल से रियल टाइम डेटा मिल रहा है। केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती से बूथ कैप्चरिंग और अन्य धाँधलियों को कम करने में मदद मिल रही है।

फिर भी उषा जी जैसे लोग वोट डालने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसकी वजह निचले स्तर पर चुनाव अधिकारियों का रवैया है। मतदाता सूची तैयार करने में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा नहीं है। न ही वोट डालने में।

मांग उठने लगी है कि लोगों को घर बैठे ही इंटरनेट के ज़रिए वोट डालने की सुविधा मुहैया कराने पर विचार किया जाए। पोस्टल बैलेट की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए। चुनाव कार्यक्रम को कम जटिल और छोटा बनाया जाए। पूरा मतदान खत्म होने के साथ ही मतगणना शुरू कराई जाए और इस काम में तीन-चार दिनों की देरी रोकी जाए।

चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों के मूवमेंट में कठिनाई के नाम पर कई चरणों में चुनाव कराने की जो परंपरा शुरू की अब वो आम हो गई है। लोक सभा छोड़िए, कई राज्यों में तो विधानसभा चुनाव भी कई चरणों में दो-दो महीनों तक चलते रहते हैं। सारे चुनाव एक साथ करा पाना शायद अभी मुमकिन न हो पाए, मगर आयोग को उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ऐसा करके वो शायद उषाजी जैसे हज़ारों-लाखों मतदाताओं के लोकतंत्र में विश्वास को मज़बूत ही करेगा और उन्हें ख़ाली हाथ घर लौटने से रोक सकेगा। 

Sunday, 11 May 2014

'कमल निशान और नंबर तीन'


सुबह अख़बार खोला तो एक पर्चा झटक कर गिर गया। बनारस लोक सभा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का पर्चा। इसमें गुजरात में किसानों की भलाई के लिए किए गए मोदी सरकार के कामों का ब्यौरा है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकारों द्वारा किसानों के कल्याण के लिए उठाए गए क़दमों का ज़िक्र है। आख़िर में बनारस के लोगों से अपील है "मत भूलो मतदान का दिन, कमल निशान और नंबर तीन!"

दरअसल, बनारस चुनाव में ईवीएम पर नरेंद्र मोदी का नाम तीसरे नंबर पर है। इसीलिए बीजेपी मतदाताओं को उनके नाम, ईवीएम पर क्रम और चुनाव चिन्ह के बारे में बता रही है। पर्चे के आख़िर में क्रम संख्या ३ के साथ नरेंद्र मोदी का नाम और कमल निशान के साथ फ़ोटो दिया गया है ताकि वोटरों को पहचानने में आसानी हो।

वैसे मोदी का नाम चाहे ईवीएम पर तीसरे नंबर पर हो, मगर मतगणना के दिन पहले नंबर पर रहेगा, इस बात को लेकर कम ही लोगों के मन में संदेह है। नरेंद्र मोदी ने बनारस शहर में सिर्फ दो दिन प्रचार किया है। पहली बार २४ अप्रैल को पर्चा भरते वक़्त और दूसरी बार आठ तारीख़ को रोहनिया में चुनावी सभा और उसी दिन बीएचयू से रथयात्रा चौराहे पर बीजेपी चुनाव कार्यालय तक गाड़ी से सफ़र। जिसे रोड शो का नाम नहीं दिया गया लेकिन था वो रोड शो ही।

प्रचार के अंतिम दिन बनारस में राहुल गांधी ने कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय के पक्ष में रोड शो किया तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार कैलाश चौरसिया के पक्ष में रोड शो किया। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल नौ तारीख़ को रोड शो कर चुके थे। बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार ग्रामीण इलाक़ों में प्रचार कर रहे हैं।

लेकिन बाक़ी तमाम दलोंे में लड़ाई दूसरा-तीसरा या चौथा नंबर हासिल करने की है। सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठा अरविंद केजरीवाल की दाँव पर लगी है जिन्होंने इस लोक सभा चुनाव में अपना एकमात्र लक्ष्य नरेंद्र मोदी को हराने का रखा है। केजरीवाल की कोशिश है किसी तरह से दूसरे नंबर पर आने की लेकिन स्थानीय कांग्रेसी विधायक अजय राय इसमें आगे दिख रहे हैं। राहुल के रोड शो से भी अजय राय के हौंसले बुलंद हुए हैं। आम आदमी पार्टी के समर्थकों का दावा था कि शहर के तीन लाख मुसलमान एक मुश्त केजरीवाल के पक्ष में हैं और अजय राय को समर्थन देने की मुख़्तार अंसारी की अपील का उन पर असर नहीं हुआ है। जबकि हक़ीक़त में ऐसा है नहीं । मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में है। जबकि बाकी वोट आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी में बंट रहे हैं। 

सपा उम्मीदवार चौरसिया को राज्य में पार्टी की सरकार होने का फ़ायदा भी मिल रहा है। स्थानीय डीएम प्रांजल यादव के विवाद और शहर में उनके विकास कार्यों की सेहरा भी उन्हें मिलने की वजह से मोदी विरोधी मतदाताओं में केजरीवाल की तुलना में समाजवादी पार्टी के प्रति अधिक आकर्षण है। लेकिन ग़रीब तबके और कुछ ग्रामीण इलाक़ों में ज़बर्दस्त प्रचार का फ़ायदा केजरीवाल को मिला है। इसलिए नंबर दो-तीन और चार की लड़ाई इन्हीं तीनों उम्मीदवारों के बीच है। 

जहाँ तक बीजेपी का सवाल है उसकी कोशिश मोदी को बड़ी जीत दिलाने की है। पिछले चुनाव में मुरली मनोहर जोशी बमुश्किल क़रीब १७ हज़ार वोटों से जीत पाए थे। बीजेपी का लक्ष्य है कि मोदी बनारस में वड़ोदरा से भी ज़्यादा वोटों से जीते। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह इशारा कर चुके हैं कि दोनों सीटों से जीतने की सूरत में मोदी बनारस अपने पास रखेंगे। बीजेपी की कोशिश है कि मतदान ज़्यादा हो ताकि जीत का फ़ासला बढ़ सके। पार्टी बनारस से कह रही है वो एम पी के लिए वोट डालेंगे लेकिन उन्हें पीएम भी मिलेगा। यानी बाय वन, गेट वन फ़्री!! 

Tuesday, 6 May 2014

‘नीच राजनीति’ पर मोदी का पलटवार

नीच राजनीति करने के प्रियंका गांधी के आरोप का नरेंद्र मोदी ने अपने ही अंदाज़ में जवाब दिया है। मोदी ने इसे अपनी पिछड़ी जाति की पृष्ठभूमि से जोड़ दिया है। मंगलवार सुबह उन्होंने एक के बाद एक इस मुद्दे पर चार ट्वीट किए। इसमें मोदी ने कहा कि सामाजिक रूप से निचले वर्ग से आया हूं इसलिए मेरी राजनीति उन लोगों के लिए नीच राजनीति ही होगी।

दरअसल, कल अमेठी में जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने एक के बाद एक गांधी परिवार पर निशाने साधे थे, प्रियंका ने उसका जवाब दिया था। मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री का अपमान करने का आरोप लगाया था। इसी तरह से उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के कथित अपमान के लिए भी गांधी परिवार को आड़े हाथों लिया था। इसके जवाब में प्रियंका ने कहा कि उन्होंने अमेठी की धरती पर मेरे शहीद पिता का अपमान किया है। अमेठी की जनता इस हरकत को कभी माफ नहीं करेगी। इनकी नीच राजनीति का जवाब मेरे बूथ के कार्यकर्ता देंगे। अमेठी के एक-एक बूथ से जवाब आएगा।

पिछड़े वर्ग से आने वाले नरेंद्र मोदी की जाति का मुद्दा पहली बार नहीं उठा है। कुछ कांग्रेसी नेताओं के इसी तरह के बयानों पर पहले भी हंगामा हो चुका है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने मोदी और मनमोहन सिंह की तुलना करते हुए एक बार कह दिया था कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। बीजेपी के तीखा एतराज़ करने के बाद कांग्रेस की ओर से सफाई आई थी कि इसे मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। नरेंद्र मोदी ने भी अपने पिछड़े वर्ग का हवाला इससे पहले दिया है। इस साल जनवरी में दिल्ली के रामलीला मैदान पर राष्ट्रीय परिषद के अपने भाषण में भी उन्होंने खुद के पिछड़े वर्ग से आने की बात कही थी और पार्टी का इस बात के लिए आभार जताया था कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जैसी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

हालांकि जाति के हिसाब से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनावी दौर में इस पहचान को पहली बार उछाला गया है। इन दोनों ही राज्यों में मतदान के दो अंतिम चरण बचे हैं। दोनों ही जगह वोटिंग के पहले दो दौर बीजेपी के लिए बेहद अनुकूल रहे हैं। जबकि उसके बाद खासतौर से बिहार में लालू प्रसाद के पक्ष में मुसलमान और यादव का माई गठजोड़ तेज़ी से ध्रुवीकृत होते देखा गया है। इसी तरह से बुंदेलखंड, अवध के बाद अब पूर्वांचल में भी मोदी लहर जाति की दीवारों से टकरा रही है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बने सांप्रदायिक माहौल का सीधा-सीधा फायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा था।

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के ओबीसी कार्ड को प्रमुखता से न उठाने का  फैसला किया था। इसके पीछे एक वजह ये भी बताई गई थी कि मोदी जिस घांची समाज से आते हैं राज्य में उसके अधिक मतदाता नहीं हैं। साथ ही, इस पहचान को अधिक प्रभावी ढंग से रेखांकित करने पर पिछड़े वर्ग के एकजुट होने के बजाए बंटने की आशंका भी थी क्योंकि शायद पिछड़े वर्ग के दूसरे तबकों को लगता कि उनके समाज को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। इसी तरह लंबे समय बाद ब्राह्मण मतदाता बीजेपी की तरफ वापस आ रहे हैं। पार्टी मोदी की ओबीसी पहचान को उछाल कर उन्हें बिदकाना नहीं चाह रही थी।

बीजेपी के रणनीतिकार कहते हैं कि मंदिर आंदोलन के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश-बिहार में यादवों को छोड़ बाकी सारी पिछड़ी जातियां बीजेपी के पक्ष में इकट्ठी होती दिख रही हैं। मोदी का पिछड़े वर्ग से आना इसमें जरूर एक कारण है। लेकिन एक और कारण उनकी हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की छवि होना भी है। बीजेपी ने इसीलिए करीब एक तिहाई यानी 24 टिकट पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों को दिए हैं। पटेल, कुशवाहा, कुर्मी के अलावा लोध, निषाद, बिंद, केवट, मल्लाह, सैनी, प्रजापति, नोनिया, भुर्जी, बारी, नाई, शाक्य, सैनी जैसे पिछड़े वर्ग की जातियों पर बीजेपी ने खास ध्यान दिया है। इसी तरह गैर जाटव दलित समाज पर भी बीजेपी की नज़रें रही हैं। इनमें वाल्मिकी, पासी, खटीक और कोरी शामिल हैं जो 21 फीसदी दलित वोटों में से नौ फीसदी हैं। यादव, मुसलमान और जाटव को छोड़ बाकी सारे वोटों को अपने पक्ष में लाने की उसकी कोशिश रही है।

ये सही है कि प्रियंका के बयान की वजह से ही मोदी को अपने पिछड़ी वर्ग की पहचान बताने का मौका मिला है। ये बीजेपी के लिए फायदेमंद भी है। पूर्वांचल की जिन 33 सीटों पर अंतिम दो दौर में मतदान होना है वहां बीजेपी के पास सिर्फ चार सीटें हैं। बीजेपी को लगता है कि कई सीटों पर जातिगत समीकरण उसके उम्मीदवारों के खिलाफ जाते दिख रहे हैं। ऐसे में मोदी का ओबीसी कार्ड चलना कोई हैरानी की बात नहीं है।


Monday, 5 May 2014

अमेठी का बदला बनारस में?


इसे अघोषित समझौता कहें। या एक राजनीतिक परिपाटी। पर कुछ अपवादों को छोड़ ऐसा होता आया है। बड़े नेता चाहे देश भर में घूम-घूम कर एक-दूसरे पर तीखे और करारे हमले करें, मगर एक-दूसरे के चुनाव क्षेत्रों में प्रचार करने नहीं जाते। राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी में नरेंद्र मोदी की रैली एक ऐसा ही अपवाद है।

बीजेपी ने अमेठी में मोदी की रैली कराने का फैसला बहुत सोच-समझ कर किया। पार्टी में इसे लेकर एक राय नहीं है। कई बड़े नेता उस अघोषित समझौते या परिपाटी को तोड़ने को खिलाफ हैं। यहां तक कि मोदी को छोड़ कोई दूसरा बड़ा नेता वहां पार्टी का प्रचार करने नहीं गया है। अमेठी में मोदी की रैली कराने का फैसला पार्टी के महासचिव और यूपी के प्रभारी अमित शाह का माना जा रहा है।

दरअसल, शाह का मानना था कि स्मृति ईरानी के रूप में बीजेपी अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है। गांधी-नेहरू परिवार का गढ़ बन चुके अमेठी में बीजेपी पहले भी चुनाव जीत चुकी है। कांग्रेस से बीजेपी में आए संजय सिंह ने 1998 में ये सीट जीती थी। हालांकि तब सोनिया या राहुल मुकाबले में नहीं थे। 1999 में सोनिया गांधी यहां से लड़ीं और जीतीं। 2004 में वो पास की राय बरेली सीट चली गईं और राहुल गांधी यहां से लड़े और तब से सांसद हैं।

मोदी की अमेठी में रैली कराने के पीछे सोच ये है कि बीजेपी पूरे राज्य में लड़ाई में दिखनी चाहिए। पार्टी रायबरेली की तरह अमेठी में वॉक ओवर नहीं देना चाहती थी। अमेठी में स्मृति ईरानी जैसा मज़बूत उम्मीदवार उतारने के पीछे भी यही सोच थी। रायबरेली में पार्टी सोनिया गांधी के मुकाबले उमा भारती को उतारने की सोच रही थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

इसमें कोई शक नहीं है कि पूरे देश में अमेठी-रायबरेली की पहचान गांधी परिवार से होने लगी है। स्थानीय लोगों को इस बात का गर्व है। जबकि विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को ये संतोष है कि इसी बहाने कम से कम उनकी पूछ तो होती है। ये ज़रूर है कि चाहे अमेठी और रायबरेली वीआईपी सीटें हों, लेकिन उत्तर प्रदेश के अन्य चुनाव क्षेत्रों की ही तरह वहां भी तमाम तरह के स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं। बिजली-सड़क-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को तरसते अमेठी और रायबरेली के लोग ये उम्मीद भी छोड़ चुके हैं कि सोनिया-राहुल इन मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देंगे।

लेकिन नरेंद्र मोदी के अमेठी में चुनाव प्रचार करने से वहाँ चुनाव का नतीजा बदल जाएगा, इसकी संभावना बेहद कम है। राहुल के चुनाव क्षेत्र में मोदी के चुनाव प्रचार करने का मकसद यही दिखाना लगता है कि बीजेपी इस लड़ाई को बेहद गंभीरता से ले रही है। कोई हैरानी नहीं है कि लोग अब पूछने लगे हैं कि अमेठी में क्या होगा? जबकि वहां के चुनाव परिणाम में किसी बड़े उलट-फेर की बात कोई नहीं करता है। महत्वपूर्ण बात ये भी है कि प्रियंका गांधी ने अमेठी और रायबरेली में डेरा डाल कर मोदी पर सीधे हमले किए हैं और उन्हें इसका जवाब देने के लिए मजबूर किया। करीब डेढ़ हफ्ते से मीडिया में प्रियंका सीधे मोदी से टक्कर लेती दिख रही हैं जबकि राहुल-सोनिया पीछे छूट गए।

सवाल ये है कि कांग्रेस इसका जवाब कैसे देगी?  बनारस में कांग्रेसी उम्मीदवार अजय राय के समर्थन में प्रचार की बात से प्रियंका इनकार कर चुकी हैं। बीच में खबर आई थी कि शायद प्रियंका काशी विश्वनाथ का दर्शन करने के बहाने ही बनारस का दौरा कर लें, लेकिन इसका भी खंडन कर दिया गया। कांग्रेसी रणनीतिकार इस बात से भी इनकार कर रहे हैं कि बनारस में सोनिया या राहुल की चुनावी सभा होगी। ये ज़रूर है कि बनारस में अजय राय के लिए रणनीति बनाने का जिम्मा कांग्रेस के बेहद सुलझे हुए नेता गुलाम नबी आजाद को दे दिया गया है। लेकिन ये सब बातें तब की हैं जब मोदी का अमेठी में चुनावी सभा करने का कार्यक्रम नहीं बना था। अब बदले हालात में शायद कांग्रेस भी अपनी रणनीति पर दोबारा सोचे और राहुल या सोनिया को बनारस में चुनाव प्रचार के लिए उतारे।


1984 में अटल बिहारी वाजपेयी को माधव राव सिंधिया ने हराया था। बीजेपी समेत तमाम विपक्षी दलों के दिग्गज हार गए थे। लोक सभा में कांग्रेस के खिलाफ बोलने के लिए कोई दमदार विपक्षी नेता नहीं बचा था। शायद इसी से सबक लेकर ये अघोषित समझौता या परिपाटी बनी हो कि कुछ बड़े नेताओं का लोक सभा में होना लोकतंत्र के लिए भी ज़रूरी है। हालांकि 1999 में बेल्लारी में सोनिया गांधी के खिलाफ सुषमा स्वराज मैदान में उतरी थी। लेकिन बड़े राजनीतिक विरोधी के चुनाव क्षेत्र में प्रचार न करने की परंपरा कायम बनी रही। इस बार वो भी टूट गई है।

Saturday, 3 May 2014

दादा, दीदी या मोदी?


 भर दोपहर, सिर पर चढ़े सूरज का कहर। कोई छाता लिए, तो कोई सिर पर कपड़ा डाले हुए। उमस भरी गर्मी से निजात पाने के लिए हर कोई अपने हिसाब से तैयारी कर आया है। बैरकपुर में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की सभा में जुटे लोगों में सिर्फ मोदी के नाम पर उत्साह है। बीजेपी का झंडा फहराता दिख रहा है। दीवारों पर हिंदी में लगे चुनावी इश्तहार इशारा कर रहे हैं कि इस इलाके में हिंदी-उर्दू भाषियों का ज़ोर है। करीब चालीस फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। बड़ी संख्या में बिहार-झारखंड से आए लोग भी बसे हैं।

लोगों में बीजेपी के प्रति एक उत्सुकता है। मोदी के नाम का आकर्षण उन्हें इस चिलचिलाती धूप में भी राजनाथ सिंह की सभाओं में खींच रहा है। लेकिन क्या बीजेपी को सीटें मिलेंगी? इस सवाल पर करीब-करीब सभी का एक जैसा ही जवाब है- इक्का-दुक्का सीटें जीतने की स्थिति में ही है बीजेपी। हालांकि खुद बीजेपी नेताओं का दावा है कि दार्जीलिंग के अलावा बीजेपी इस बार स्टार उम्मीदवारों के बूते कुछ अन्य चुनाव क्षेत्रों में भी बाजी मार सकती है। खासतौर से सुप्रियो बाबुल, बप्पी लाहिरी और जॉर्ज बेकर पर पार्टी की उम्मीदें टिकी हैं। बीजेपी को लगता है मोदी का नाम और इन सितारों की चमक शायद उसे फायदा पहुँचाए।

लेकिन बंगाल में ममता का जादू चल रहा है। परिवर्तन के नाम पर लेफ्ट पार्टियों को दरवाज़ा दिखा कर सरकार बनाने वाली ममता के तीन साल के काम काज पर चाहे अलग-अलग बातें हो रही हों। पर अभी ये सबूत नहीं मिलते कि ममता से लोगों का मोह भंग होना शुरू हुआ हो। ममता बंगाल के विकास के नाम पर चुनाव लड़ रही हैं। मोदी को गुजरात का कसाई बोल कर उनकी पार्टी ने खुद को बीजेपी के सामने खड़ा कर लिया है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को खदेड़ने के नरेंद्र मोदी के बयान को ममता बनर्जी की पार्टी ने उछाल दिया है।

राजनाथ सिंह अपने भाषणों में मोदी के बयान पर सफाई देते हैं। कहते हैं उनका मतलब अवैध रूप से घुस आए बांग्लादेशियों के बारे में था। बीजेपी और तृणमूल के बीच हुई बयानों की गर्मी पर भी राजनाथ पानी डालने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि अगर दिल्ली में मोदी सरकार आई तो पश्चिम बंगाल को विशेष पैकेज देने के लिए काम शुरू किया जाएगा। ये ममता बनर्जी की महत्वपूर्ण मांग है। लेकिन राज्य के विकास के लिए कदम न उठाने के लिए राजनाथ ममता पर भी निशाना साधते हैं।

ममता को लेकर बीजेपी की एक दुविधा भी है। इससे पहले ममता बनर्जी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं। उस सरकार के अपना कार्यकाल पूरा करने में ममता की बड़ी भूमिका भी रही थी। 16 मई के नतीजों में अगर एनडीए बहुमत से दूर रहता है तो उसे जयललिता, ममता और नवीन पटनायक से समर्थन की ज़रूरत पड़ सकती है। 2016 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने हैं और ऐसे में ये संभावना कम ही है कि ममता खुल कर मोदी के साथ आएं। लेकिन विशेष पैकेज के नाम पर उनसे शर्तों के आधार पर समर्थन लेने का विकल्प खुला रखा जा सकता है।

वैसे तो बंगाल में चार पार्टियों में मुकाबला है। तृणमूल और लेफ्ट परंपरागत विरोधी हैं। कांग्रेस और बीजेपी भी अपनी ओर से दम मारते रहे हैं। लेकिन मोदी के अभियान और बीजेपी पर तृणमूल के लगातार हमलों से ऐसा आभास दिया जा रहा है कि जैसे मुकाबला बीजेपी और तृणमूल के बीच ही हो रहा है। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। ये ज़रूर है कि 2011 की हार से लेफ्ट फ्रंट अभी तक उबर नहीं पाया है। न ही लोगों में इस लोक सभा चुनाव में उसे वोट देने के लिए कोई उत्कंठा है।

लेकिन इस चुनाव को तृणमूल बनाम बीजेपी का मुकाबला बनाना दोनों ही पार्टियों के लिए अनुकूल है। बीजेपी को लगता है कि पिछले तीन साल में ममता के खिलाफ जो लोग हुए हैं वो बजाए लेफ्ट के उसे वोट दे सकते हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी के भाषणों में भी लेफ्ट के बजाए ममता पर ही तीखा निशाना है। एक बीजेपी नेता तो बढ़-चढ़ कर यहां तक कहते हैं कि बंगाल में जो स्थिति लेफ्ट की थी वो आज ममता की है। और जो ममता की थी वो बीजेपी की है। जबकि मोदी और बीजेपी पर हमला करने से ममता को अपने मुस्लिम मतदाताओं को साथ लेने में मदद मिलती है। लेफ्ट के साथ-साथ वो कांग्रेस और बीजेपी पर भी हमला कर ये संदेश देती हैं कि वो उसे ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रहीं। लेफ्ट पार्टियों के नेता इसे बीजेपी और तृणमूल के बीच नूरा-कुश्ती बताते हैं।

वैसे इस बात पर कई लोग सहमत हैं कि बीजेपी इस चुनाव में पश्चिम बंगाल में ज़्यादा सीटें चाहे न जीत पाए लेकिन उसके वोट प्रतिशत में मोदी के नाम पर ज़बर्दस्त इज़ाफा होगा। राम जन्मभूमि आंदोलन के वक्त बीजेपी को राज्य में 12 फीसदी वोट मिले थे। इस बार ये आंकड़ा निश्चित रूप से पार होगा। राज्य में बीजेपी का संगठन बेहद कमज़ोर है। यहां के मारवाड़ी-गुजराती तबके में पार्टी को समर्थन है। इस बार अन्य राज्यों से आए लोगों में भी मोदी का जादू चलता दिख रहा है। बीजेपी नेता बंगाल के लोगों को याद दिलाते हैं कि जनसंघ की स्थापना बंगाल के ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। इसके बावजूद बंगाल में दादा और दीदी का विकल्प बनने के लिए मोदी को लंबा सफर तय करना है।


Thursday, 1 May 2014

मोदी पर एफ़आईआर के मायने


एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव आयोग के आदेश के बाद गुजरात सरकार ने दो एफआईआर दर्ज कर ली हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि मोदी ने जनप्रतिनिधित्व कानून की दो धाराओं 126 (1)(a) और 126 (1)(b) के उल्लंघन किया है। इससे पहले कांग्रेस ने चुनाव आयोग को शिकायत की थी कि नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर में अपना वोट डालने के बाद जिस तरह से प्रेस कांफ्रेंस की है वो आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है लिहाज़ा उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। चुनाव आयोग ने इस शिकायत पर तुरंत कार्रवाई की। साथ ही गुजरात सरकार को ये निर्देश भी दिया था कि वो शाम छह बजे तक सूचित करे कि क्या कार्रवाई की गई है। चुनाव आयोग ने मोदी की प्रेस कांफ्रेंस को दिखाने वाले टीवी चैनलों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करने को कहा।

नरेंद्र मोदी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि जीवन में पहली बार उनके खिलाफ कोई एफआईआर हुई है और वो इस दिन को कभी नहीं भूलेंगे। मोदी ने कहा कि अगर कोई चाकू, पिस्तौल या बंदूक से धमकाए तो उसके खिलाफ एफआईआर समझ में आती है। लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज हुई क्योंकि उन्होंने लोगों को कमल का फूल दिखाया। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस पर हमला किया है। मोदी ने तिरूपति में एक चुनावी रैली में कहा कि कांग्रेस चाय बेचने वाले डर गई है।

मोदी ने एक बार भी चुनाव आयोग का नाम नहीं लिया और एफआईआर के लिए सीधे कांग्रेस को ही ज़िम्मेदार ठहराया है। बीजेपी ने कांग्रेस द्वारा किए गए संवैधानिक संस्थाओं के कथित अपमान को इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनाया है। यूपीए सरकार के खिलाफ अपनी चार्ज शीट में भी बीजेपी ने कांग्रेस पर सीवीसी, सीएजी और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है। यही वजह है कि मोदी अपने खिलाफ एफआईआर को लेकर चुनाव आयोग के सामने खड़े होते नहीं दिखना चाहते हैं। हालांकि गुजरात में अपने शुरुआती दौर में वो चुनाव आयोग से दो-दो हाथ कर चुके हैं। राज्य में 2002 में चुनावों में देरी के लिए उन्होंने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह पर निशाने साधे थे।

लेकिन बीजेपी नेता चुनाव आयोग की कार्रवाई और उसकी रफ्तार पर जरूर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि वो खुल कर इस बारे में ज़्यादा कुछ कहने को तैयार नहीं है। पार्टी नेताओं के मुताबिक नरेंद्र मोदी ने आदर्श आचार संहिता का कोई उल्लंघन नहीं किया है। बीजेपी का दावा है कि मोदी ने पत्रकारों से बातचीत पोलिंग बूथ से दो सौ मीटर दूर की थी। जहां तक प्रेस कांफ्रेंस का सवाल है, ये एक आम बात है कि वोट डालने के बाद तमाम नेता पत्रकारों से बातचीत करते हैं। सुरक्षा के लिहाज़ से मोदी के लिए अलग से इंतज़ाम किया गया था जिसे प्रेस कांफ्रेंस का नाम देना ठीक नहीं होगा। मोदी ने राजनीतिक मसलों पर अपनी बात तभी कही जब उनसे इस बारे में पत्रकारों ने सवाल पूछे।

बीजेपी नेता ये भी कहते हैं कि चुनाव चिन्ह कमल को कुर्ते पर लगाना आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। उनकी दलील है कि जब तक चुनाव चिन्ह के साथ उस पर वोट देने की अपील न की जाए, ये संहिता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। पोलिंग बूथ पर राजनीतिक दलों के एजेंट चुनाव चिन्ह लगा कर बैठ सकते हैं। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता झाड़ू के चुनाव चिन्ह वाली टोपियां लगा कर वोट देने जाते हैं। जबकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह वोट डालने के बाद हाथ हिलाते हैं जो उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह है।

बीजेपी जनप्रतिनिधित्व कानून की उन धाराओं में उल्लेखित चुनाव सामग्री शब्द की व्याख्या पर भी सवाल उठा रही है। पार्टी का कहना है कि उसके घोषणापत्र जारी करने के वक्त भी इसी शब्द के तहत सवाल उठाए गए थे और मीडिया को टेलीकास्ट करने से रोकने की बात कही गई थी। जबकि कोई भी राजनीतिक दल किसी भी वक्त अपना घोषणापत्र जारी कर सकता है।

हालांकि कानून के जानकार बीजेपी के एतराज को खारिज कर रहे हैं। उनके मुताबिक चुनाव आयोग ने नौ अप्रैल को एक आदेश में कहा था कि किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह वाली टोपी, शाल या कपड़ों में कोई पोलिंग बूथ पर नहीं जा सकता। मोदी ने वोट डालने के बाद राजनीतिक बयान दिए जिन्हें टीवी पर दिखाया और इससे मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। मोदी अपने हाथ में पूरे वक्त बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल लिए हुए थे और लहराते रहे, जो एक तरह से पार्टी का प्रचार करना ही कहा जाएगा।


वैसे तो जनप्रतिनिधित्व कानून की इन धाराओं के उल्लंघन पर दो साल की सज़ा तक का प्रावधान है। पर ऐसे मामले दुर्लभ हैं जिनमें ये सज़ा हुई हो। इसलिए ये देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में आगे जा कर मोदी के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है। ये ज़रूर है कि इस विवाद से मोदी को एक तरह से फायदा ही हुआ है क्योंकि कल मतदान के दिन वो टीवी पर छाए रहे और वो भी अपना चुनाव चिन्ह कमल लहराते हुए।