Sunday, 8 February 2015

मांझी की नैय्या, बीजेपी की पतवार

बिहार को लेकर बीजेपी कहती है कि उसकी रणनीति इंतजार करो और देखो है। लेकिन हकीकत में बीजेपी की कोशिश है नीतीश कुमार को सत्ता का लालची व्यक्ति साबित करना। नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से ही एक के बाद एक लगातार गलतियां करते जा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को हटा कर खुद फिर से मुख्यमंत्री बनना उनकी एक और गलती बताई जा रही है।

लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के हाथों मिली करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर महादलित वर्ग के जीतन राम मांझी को ये सोच कर मुख्यमंत्री बनाया था कि वो भरत की तरह राम की खड़ाऊ सिंहासन पर रख कर शासन चलाएंगे और जिस दिन नीतीश इशारा करेंगे, मांझी उनके लिए कुर्सी खाली कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बीजेपी के भीतर ये सोच है कि मांझी सरकार को बचाने के लिए पार्टी सीधे तौर पर कोई कोशिश करती हुई नहीं दिखाई दे। क्योंकि पार्टी नेताओं को लगता है कि ऐसा करने पर मांझी सरकार की अलोकप्रियता और नाकामी की बीजेपी भी हिस्सेदार बन जाएगी। लेकिन मांझी को सामने रख कर बीजेपी नीतीश पर हमले करते रहेगी। राम विलास पासवान, शाहनवाज हुसैन और गिरिराज सिंह के मांझी के समर्थन में और उनकी महादलित के नेता के रुप में उभारने के बयान इसी रणनीति के तहत आए हैं।

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मांझी से मुलाकात कर बिहार में संदेश दे दिया है कि बीजेपी चाहे मांझी को नाकाम मुख्यमंत्री माने लेकिन आने वाले वक्त में पार्टी उनका इस्तेमाल खासतौर से महादलित वोटों को अपने साथ लाने में कर सकती है। इस मुलाकात ने भविष्य में मांझी के बीजेपी के साथ आने के रास्ते भी खोल दिए हैं।

मांझी अब विधानसभा में बहुमत साबित करने को कह रहे हैं। ये संभावना कम ही है कि बीजेपी विधानसभा में उन्हें खुल कर समर्थन दे। या तो उनके विश्वास मत पर मतदान की नौबत ही नहीं आएगी क्योंकि मांझी इससे पहले भी इस्तीफा दे सकते हैं।

तब तक बीजेपी नीतीश पर हमले करते रहेगी। पार्टी कह चुकी है कि वो राज्य में चुनाव चाहती है जो वैसे भी इस साल के अंत में होने हैं। राष्ट्रपति शासन का विकल्प भी खुला रखा जा रहा है। इस बीच, नीतीश कुमार सरकार बनाने के लिए राजभवन से राष्ट्रपति भवन तक दौड़ लगाएंगे। विधायकों की परेड कराएंगे। लालू-मुलायम भी उनके साथ रहेंगे। ये सब करने पर बीजेपी उन पर सत्ता का लालची होने का आरोप लगाएगी।

अधिक संभावना यही है कि राज्य में चुनाव तय समय पर यानी दीवाली और छठ के आसपास हों। गर्मी में चुनाव की संभावना कम है क्योंकि चुनाव आयोग तब तक तैयारी नहीं कर पाएगा। बारिश में राज्य के कई इलाके बाढ़ प्रभावित होते हैं। हर लिहाज़ से अक्तूबर-नवंबर चुनाव के लिए सही बैठता है।

राज्यपाल की भूमिका बेहद अहम है। वो जो भी फैसला करेंगे वो संवैधानिक मान्यताओं के हिसाब से तो होगा ही उसके पीछे जेडीयू को बीजेपी की राजनीति भी नजर आएगी। नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने में वैसे कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए क्योंकि विधायक उनसे साथ ज्यादा हैं। पर ये फैसला होगा भी या नहीं और होगा तो कब होगा ये देखना दिलचस्प रहेगा क्योंकि इसी फैसले की बुुनियाद पर बिहार की आगे की राजनीति तय होगी।