Saturday, 20 June 2015

फोटो ब्लॉग- हिमालय की गोद में




जून के पहले हफ्ते मैं सपरिवार कुमाऊं की आठ दिन की यात्रा पर गया था। इस यात्रा की कई खट्टी-मीठी यादें हैं जो इस ब्लॉग के माध्यम से आप सब लोगों से बांट रहा हूं। 

एक जून 2015 पहला दिन

सुबह सात बजे हम रानीखेत के लिए निकले। मैं खुद गाड़ी चला रहा था। गूगल मैप ने एक दूसरा रास्ता सुझाया। रामपुर से स्वार-बाजपुर होते हुए कालाढूंगी फिर नैनीताल और रानीखेत। ये एक शॉर्ट कट है और इससे काफी समय बच जाता है। बाजपुर से पहले पांच किलोमीटर सड़क काफी खराब है। वहां गाड़ी चलाते समय सिर्फ एक ही सवाल दिमाग में आता है- ये गड्ढे कब खत्म होंगे? खैर शाम चार बजे हम रानीखेत पहुंचे। मैंने अपनी इस पूरी यात्रा में कुमाऊं मंडल विकास निगम के टूरिस्ट रेस्ट हाऊस में रुकने का फैसला किया था और वहां एडवांस बुकिंग कराई थी। लिहाज़ा रानीखेत में केएमवीएन के चिलियानौला टीआरएच में ही पहुंचे। थोड़ी देर बाद सूर्यास्त होने वाला था।

रानीखेत में सूर्यास्त
 रात को यहां खाने की खास बात रही कुमाऊं व्यंजनों का लुत्फ। हमने दाल और आलू की सब्जी का ऑर्डर किया। कुमाऊं व्यंजनों की खास बात है कि इनमें मैदानी मसालों के बजाए पहाड़ी हर्ब्स का छोंक लगाया जाता है। इनका स्वाद हमें हमेशा याद रहेगा।

दो जून 2015 दूसरा दिन

सुबह नाश्ता कर करीब दस बजे हम रानीखेत घूमने निकले। फलों का मशहूर बगीचा चौबटिया गार्डन देखा और वहां से आड़ू और आलूबुखारे खरीदे। यहां से बुरांश का ज्यूस भी लिया जिसने बाद के दिनों की पूरी यात्रा में हमारा भरपूर साथ दिया।  पहाड़ों की रानी रानीखेत की सुंदरता में चार चांद लगाने के लिए वहां स्वच्छता का खास ध्यान रखने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले कुमाऊँ रेजीमेंट के विभिन्न ठिकानों को देखते हुए गोल्फकोर्स देखा और फिर चौकोड़ी के लिए निकल गए। रास्ते में रानीखेत के घने जंगलों की सुंदरता ने मन मोह लिया।
रानीखेत की सुंदरता
रानीखेत से चौकोड़ी के रास्ते में हम बागेश्वर रुके। यहां महादेव का बहुत सुंदर मंदिर है। यहां सरयू और गोमती का संगम होता है। 
बागेश्वर में सरयू नदी

बागेश्वर से चौकोड़ी के रास्ते पर पहली बार हिमालय के दर्शन हुए। वैसे तो रानीखेत से भी हिमालय की पर्वतमालाएं दिखती हैं मगर गर्मियों में ऐसा कम ही हो पाता है। 

चौकोड़ी के रास्ते पंचचूली के दर्शन
शाम होते-होते हम चौकोड़ी पहुंच गए। यहां पर केएमवीएन का टीआरएच दूर से ही इतना सुंदर दिखता है कि रास्ते की सारी थकान दूर हो जाती है। वैसे तो हमें चौकोड़ी सिर्फ एक दिन ही रुकना था लेकिन यहां की सुंदरता देखते हुए हमने दो दिन रुकने का फैसला किया। 

केएमवीएन चौकोड़ी

तीन जून 2015 तीसरा दिन

केएमवीएन चौकोड़ी के मैनेजर जोशीजी बेहद मिलनसार हैं। उन्होंने हमें सुझाव दिया कि हम अगले दिन पाताल भुवनेश्वर जाएं। सुबह नाश्ता करने के बाद हम पाताल भुवनेश्वर के लिए निकले। बीच में सड़क बहुत खराब है। कई लोग इसकी बुरी हालत देखते हुए वापस आ जाते हैं। खैर हम चलते रहे। पाताल भुवनेश्वर से सात किलोमीटर से पहले सड़क ठीक है। वहां प्रवेश द्वार से रेंगते हुए करीब तीस फीट नीचे उतरना पड़ता है। पानी के रिसाव से लाइम स्टोन की चट्टानों में बेहद सुंदर आकृतियां बनीं हैं। ये पूरी यात्रा बेहद रोमांचक है और यहां जरूर जाना चाहिए। पौराणिक कथाएं भी इसकी साथ जोड़ी गई हैं इसलिए श्रद्धालुओं का भी तांता बंधा रहता है। चूंकि अंदर कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं है इसलिए प्रवेश द्वार का ही फोटो लिया है।
पाताल भुवनेश्वर गुफाओं का प्रवेश द्वार

चार जून 2015 चौथा दिन

अब हम मुंस्यारी के रास्ते पर हैं। सड़क संकरी हो गई है और प्राकृतिक सौंदर्य चार गुना बढ़ गया है। पूरे रास्ते बीच-बीच में सड़क किनारे छोेटे-छोटे झरने हैं जिनका पानी सड़़क पर बहता है। इच्छा होती है पूरे रास्ते गाड़ी रोकते चलें। मुंस्यारी से पहले आता है बिर्थी जल प्रपात। ये दूर से ही दिखता है। नजदीक जाने पर इसकी गर्जना सिरहन पैदा करती है। 

बिर्थी जल प्रपात
 

पांच जून 2015 पांचवा दिन

मुंस्यिारी केएमवीएन की खास बात ये है कि जैसे ही आप कमरे से बाहर नजर डालते हैं पंचचुली चोटियां इतनी पास दिखती हैं जैसे उन्हें हाथ बढ़ा कर छू सकते हैं। मौसम तुनकमिज़ाजी है। पल में तोला पल में माशा। सुंदरता इस कदर कि इस बात पर भरोसा होता है कि ब्रम्हांड के सबसे बड़े चित्रकार ने बहुत फुर्सत में इस चित्र को बनाया है।


मुंस्यिारी का विहंगम दृश्य


मुंस्यिारी सही मायनों में पर्यटकों के लिए स्विटजरलैंड से कम नहीं है। यहां से ट्रैकिंग के कई रास्ते हैं। यहीं हैलीपेड पर हमारी मुलाकात कोलकाता के स्वपन कुमार पाल से हुई जो नंदा देवी के एडवांस बेस कैंप तक ट्रैकिंग कर आए थे। उन्होंने फोटो दिखाए तो मन ललचा उठा। फेसबुक पर उन्हें दोस्त बनाया और अब इन दुर्लभ फोटो का दीदार करते हैं। यहीं नंदा देवी मंदिर में गाड़ी सड़क पर खड़ी कर दर्शन करने गए और आए तो देखा कि किसी ने पीछे का शीशा तोड़ कर पत्नी के पर्स को खोल कर चुराने की कोशिश की। जब उसमें कुछ नहीं मिला तो छाता ही उठा ले गया। इस घटना से मन खट्टा हो गया।

ये एक अपवाद है


छह जून 2015 छठा दिन

मुंस्यिारी में दो रात बिताने के बाद हमने रुख किया बिनसर का। ये भी बहुत रोमांचक यात्रा है। केएमवीएन के आर्य साहब बिनसर केएमवीएन से कुछ महीने पहले ही आए थे। उन्होंने धौलचीना से एक शार्टकट बताया और गूगल मैप ने उनका समर्थन किया। लिहाजा अल्मोड़ा बायपास से जाने के बजाए इस रास्ते से गए और दो घंटे बचा लिए। बिनसर सेंचुरी गेट से केएमवीएन बिनसर करीब 14 किलोमीटर है। रास्ते भर झींगुरों की तेज़ आवाज़ और लंगूर स्वागत करते हैं। बियाबान, सुनसान और घने जंगलों के बीच लगता है किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गए हैं। जब पहुंचे तो सूर्यास्त होने वाला था। लिहाजा पहले सनसेट प्वाइंट ही गए।

बिनसर में सूर्यास्त


बिनसर केएमवीएन की खास बात ये है कि वहां शाम को सिर्फ दो ही घंटे यानी सात से नौ बजे तक बिजली रहती है। उसके बाद मोमबत्ती की रोशनी, पूर्णिमा के चांद का उजाला और जंगल से आती जंगली जानवरों की आवाज़ें रोमांच को दोगुना कर देती है। 

सात जून 2015 सातवां दिन

अब हम दिल्ली के रास्ते पर हैं। मगर पहाड़ों से मन नहीं भरा। इच्छा हुई कि एक रात नैनीताल जरूर रुके। ये जानते हुए भी कि रविवार है और आधी दिल्ली नैनीताल में होगी, बच्चों की वजह से नैनीताल रुकने का फैसला हुआ। मित्र अमिताभ सिंह ने मदद की और अपने होटल में एक कमरा किसी तरह से उपलब्ध करा दिया। बच्चों को नैनी झील में बोटिंग करने में बहुत मजा आया।

नैनी झील से ऐसा दिखता है नैनीताल

आठ जून 2015 आठवां दिन

सोमवार नैनीताल का ज़ू बंद रहता है। उसे देखने की इच्छा मन में ही लिए बच्चों के साथ मालरो़ड का एक चक्कर लगाने के बाद घर के लिए निकल लिए। इस बार भी गूगल मैप की मदद से प्रयोग किया। वापसी में कालाढूंगी से रामनगर और काशीपुर होते हुए मुरादाबाद का रास्ता लिया। इससे बाजपुर के पहले की पांच किलोमीटर की खराब सड़क से बचाव हुआ और समय भी कम लगा। 

इस तरह हिमालय की गोद में पूरा एक हफ्ता बिताने के बाद घर वापसी हुई। उत्तराखंड के जिस हिस्से की हमने यात्रा की वो पर्यटन की लिहाज से बहुत लोकप्रिय नहीं है। मगर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। आपको मौका लगे तो वहां जरूर जाएं। 

(All pictures taken by Apple iPhone 6 Plus)

Saturday, 13 June 2015

कैसे गिरी थी वाजपेयी की 13 महीने की सरकार?

(ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। इसी पर ये ब्लॉग कल ndtvkhabar.com पर लिखा था। मेरी कही पर भी लगा रहा हूं)

राजनीति में कोई भी स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता है, अगर होता तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आज बाँहें फैलाकर उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का स्वागत नहीं कर रहे होते। शाह से मुलाक़ात के साथ ही गमांग का बीजेपी आने का रास्ता साफ हो गया है। जल्दी ही ये औपचारिकता पूरी हो जाएगी। लेकिन गमांग के बहाने १७ साल पुराने उस विश्वास प्रस्ताव पर मतदान की याद ज़रूर ताज़ा हो गई जो वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट से हार गई थी।

बात है १७ अप्रैल १९९९ की। एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने के बाद वाजपेयी सरकार को विश्वास प्रस्ताव रखना पड़ा। सुबह से ही संसद के गलियारों में गहमागहमी थी। लोक सभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही देर पहले बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी मतदान में हिस्सा नहीं लेगी। प्रमोद महाजन समेत सरकार के रणनीतिकारों ने राहत की साँस ली।

सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सबकी नज़रें विपक्षी बेंच पर गई जहाँ उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग बैठे मुस्करा रहे थे। वो ठीक दो महीनों पहले यानी १८ फ़रवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे मगर उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया था। वो कोरापुट संसदीय क्षेत्र की नुमांइदगी कर रहे थे। सत्तापक्ष के कुछ सांसदों की ओर से लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का इस ओर ध्यान दिलाया गया। लेकिन नियमानुसार मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी है। तब तक तकनीकी तौर पर सांसद रह सकते हैं। हालाँकि नैतिक तौर पर ये कितना सही है इस पर आज भी बहस हो रही है।

जब मायावती के बोलने की बारी आई तो उन्होंने यू टर्न ले लिया। उन्होंने विश्वास मत के विरोध में वोट डालने का फैसला सुनाया और लोक सभा में हड़कंप मच गया। सरकार की स्थिति पहले ही नाज़ुक थी। प्रमोद महाजन आखिरी वक्त तक मोर्चाबंदी करते देखे जा रहे थे। पत्रकार दीर्घा खचाखच भरी हुई थी। मुझे सीढ़ियों पर बैठने की जगह मिल गई थी और वहाँ से स्पीकर की टेबल साफ देखी जा सकती है।

मतदान हुआ। गमांग ने सरकार के खिलाफ वोट दिया। तब नेशनल कांफ्रेंस के सांसद सैफ़ुद्दीन सोज़ मे पार्टी लाइन के खिलाफ जा कर सरकार के खिलाफ वोट दिया। वोटों की गिनती हुई। मैंने देखा कि बालयोगी बार-बार अपनी तर्जनी उंगुली उठा कर वाजपेयी को इशारा करने लगे। उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट था कि वो इशारा कर रहे हैं कि सरकार एक वोट से हार गई। थोड़ी देर बाद स्पीकर ने एलान किया कि विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में २६९ और विरोध में २७० वोट पड़े। तेरह महीने पुरानी वाजपेयी सरकार गिर चुकी थी।

पूरा सदन अचानक ख़ामोश हो गया। फिर विपक्षी पार्टियों का उत्साह फूट पड़ा। शरद पवार उठ कर मायावती के पास गए और गर्मजोशी से उनका शुक्रिया अदा किया। कांग्रेसी सांसद गमांग और सोज़ से लगातार हाथ मिला रहे थे। वाजपेयी ने हाथ सिर से लगा कर सलाम कर सदन का फैसला माना। बाद में पता चला कि उनके चैंबर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया भावुक हो गईं थी और उन्हें ढाँढस बँधाते हुए वाजपेयी भी विचलित हो गए थे। उसके बाद राजनीति का चक्र जिस तरह घूमा वो अब इतिहास का हिस्सा है।

अगर सरकार को एक वोट और मिला होता तो टाई हो जाता और स्पीकर वोट डाल कर सरकार को बचा सकते थे।

गमांग अब सफाई देते घूम रहे हैं कि उनके वोट से वाजपेयी सरकार नहीं गिरी। उनका कहना है कि चीफ़ व्हिप ने उनसे मतदान करने को कहा था। उनके मुताबिक़ वाजपेयी सरकार तो सोज़ के वोट से गिरी थी। उड़ीसा की राजनीति में गमांग एक बड़ा नाम है। वो कोरापुट सीट से १९७२ से लगातार आठ बार सांसद रहे और २००४ में फिर इसी सीट से जीते। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पी वी नरसिम्हाराव की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। १८ फ़रवरी १९९९ से ६ दिसंबर १९९९ तक उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे। बीजेपी का कहना है कि ७२ साल के गमांग के रूप में एक बड़ा आदिवासी नेता मिला है। राज्य में नवीन पटनायक का जादू तोड़ने में कांग्रेस और बीजेपी दोनों नाकाम रहे हैं और बीजेपी का यही कहना है कि गमांग के आने से उसे अपनी ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी।

गमांग के एक वोट से वाजपेयी सरकार के गिरने के सवाल को बीजेपी भी अब ज्यादा तूल नहीं देना चाहती है। गमांग की ही तरह उसका भी अब कहना है कि इसके लिए सोज़ ज़िम्मेदार थे। यही सियासत का मिज़ाज है जहाँ बनती-बिगड़ती, दोस्ती-दुश्मनी में पिछली बातों को भुलाकर ही आगे बढ़ा जाता है।

Thursday, 11 June 2015

चोर की दाढ़ी में तिनका


म्यांमार में की गई भारतीय सेना की कार्रवाई पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया देख कर कोई हैरानी नहीं हुई। उसका करुण क्रंदन और उसी रुआंसे स्वर में भारत को धमकी देने का अंदाज़ अपेक्षित था। मजे की बात ये है कि भारतीय सेना ने कार्रवाई म्यांमार की सीमा में घुस कर की मगर तकलीफ पाकिस्तान को हो रही है। पाकिस्तान को ऐसा ही कष्ट तब भी हुआ था जब रक्षा मंत्री मनोहर परिकर ने कहा था कि कांटे से कांटा निकलता है। चोर की दाढ़ी में तिनका मुहावरा ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए ही ईजाद हुआ है।

पहले बात म्यांमार में हुए भारतीय सेना के ऑपरेशन की। लंबे समय बाद भारतीय सेना ने ऐसा कोई ऑपरेशन किया जब उसके कमांडो दूसरे देश की सीमा में गए और वहां जा कर उन्होंने आतंकवादी ठिकानों को नष्ट किया। ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि बिना राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति और सर्वोच्च स्तर से हरी झंडी मिले बिना सेना इस तरह का ऑपरेशन नहीं कर सकती थी। 2010 में दोनों देशों में समझौता हुआ था कि भारतीय सेना आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्थानीय सेना पोस्ट कमांडर से अनुमति लेकर म्यांमार की सीमा में जा सकती है। मगर अभी तक आतंकवादी हमलों की कड़े शब्दों में निंदा कर आगे की कार्रवाई के लिए सेना के हाथ बाँध दिए जाते थे।

दूसरी बात ये है कि म्यांमार की धरती को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल क्यों होने दिया जा रहा है। कुछ वरिष्ठ रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक म्यांमार के सैन्य शासन में मध्यम और निचली पंक्ति के अधिकारियों को आतंकवादी प्रोटेक्शन मनी देते हैं। यानी इन्हें घूस दी जाती है ताकि वो उनकी गतिविधियों और ठिकानों की तरफ आँख मूंद कर बैठे रहें। भारत ने इस कार्रवाई से म्यांमार को भी कड़ा संदेश दे दिया है कि वो अपनी धरती को भारत के खिलाफ गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न होने दे। भारत के साथ म्यांमार की 1640 किलोमीटर की सीमा है जिस पर असम राइफल्स नजर रखती है। बांग्लादेश से खदेड़े जाने के बाद से ही उत्तर पूर्व के कई आतंकवादी संगठनों ने म्यांमार में पनाह ले रखी है।

अब बात पाकिस्तान की। पाकिस्तान सूचना प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की बातों से बौखलाया है। राठौड़ सेना में कर्नल रह चुके हैं। निशानेबाजी में ओलंपिक में मैडल जीता है। चार जून के हमले के बाद उनका खून भी खौला होगा। सेना के मनोबल पर इस तरह के हमलों का क्या असर होता है, राठौड़ इसे जानते हैं। खासतौर से तब जब जवानों की गाड़ी को पहले उड़ाया जाए, फिर उन पर खुखरी से हमला हो और बाद में तेल डाल कर जला दिया जाए। ऐसे में सेना जवाबी कार्रवाई करना चाहती है। ऐसा करना उसके लिए अपने जवानों के मनोबल को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। अभी तक कड़े शब्दों में भर्त्सना से काम चलता था मगर अब सरकार ने अपनी नीति बदली है।

राठौड़ इसी बदली नीति को जनता तक पहुँचा रहे थे। इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी प्रतिक्रिया उतावलेपन में थी और वो शायद कुछ ज्यादा ही बोल गए। रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े लोग भी मानते हैं कि राठौड़ को अपनी प्रतिक्रिया में संयम बरतना चाहिए था। पर ये मानने का कोई कारण नहीं है कि राठौड़ की प्रतिक्रिया सरकार की सोची समझी संवाद रणनीति का हिस्सा नहीं थी। अगर सेना ने ऐसा ऑपरेशन किया है तो राजनीतिक तौर पर भी एक संदेश देना जरूरी था। खासतौर से तब जब कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां आतंकवादी हमलों पर बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छप्पन इंच का सीना दिखाने का उलाहना देती आई हैं।

लेकिन पाकिस्तान को घबराहट क्यों हो रही है। जब देश का विभाजन हुआ ही था तब से लेकर आज तक वो लगातार अपनी धरती पर ऐसे लोगों को पालता-पोसता आया है जो सीमा पार कर भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। कारगिल जिसे हम भारत-पाकिस्तान का चौथा युद्ध मानते हैं, पश्चिमी देश लो इटेंसिटी कांफ्लिक्ट बताते हैं, वहां बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी घुसपैठ हुई थी। तब अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिकी राष्ट्रपति को ये नहीं चेताया होता कि भारत नियंत्रण रेखा पार कर सकता है, तो शायद पाकिस्तान को अपने पैर पीछे खींचने के लिए मजबूर नहीं किया गया होता।

दूसरे देश की सीमा में घुस कर आतंकवादियों या अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई सैन्य रणनीतिक भाषा में हॉट परसूट कहलाता है। जो लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि इस ऑपरेशन की सारी जानकारी सामने आने से क्या आगे इस तरह के ऑपरेशन करने में दिक्कत नहीं आएगी, ये वाजिब सवाल है। मगर ये ध्यान रहे कि अगर अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ अपने ऑपरेशन की जानकारी नहीं दी होती तो सच कभी सामने नहीं आता कि पाकिस्तान ने किस तरह ओसामा बिन लादेन को पनाह दे रखी थी। तब शायद पाकिस्तान के किसी अख़बार में अंदर के पन्नों पर एक कॉलम की खबर में जिक्र होता कि ऐबटाबाद के बाहरी इलाके में एक मकान में बम विस्फोट में कुछ अज्ञात लोग मारे गए। भारत ने म्यांमार में जो किया उसके बारे में कई सवालों के जवाब तुरंत नहीं मिल सकते क्योंकि न तो भारत और न ही म्यांमार इस बारे में पूरी जानकारी देगा। लेकिन इसके बाद भारत में ये आवाज़ें जरूर उठने लगी हैं कि पाकिस्तान के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए।


ये एक अलग विषय है कि पाकिस्तानी सीमा में घुस कर भारतीय सेना इस तरह की कार्रवाई कर सकती है या नहीं, मगर पाकिस्तान को ये तो मानना ही पड़ेगा कि अब इस तरह की कार्रवाई संभव है। ये बदली सरकार की बदली सोच भी है और राजनीतिक नेतृत्व का मजबूत इरादा भी। पाकिस्तान इसका स्वाद तब चख चुका है जब उसे सीमा पर गोलाबारी का दोगुना जवाब मिला। शायद पाकिस्तान ये मान भी रहा है। यही वजह है कि उसकी तरफ से बौखलाहट भरी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। मोदी सरकार की ये सोच दक्षिण एशिया में शांति बहाल करेगी या इसे ज्यादा अशांत करेगी, ये विश्लेषण का विषय है। मगर ये तय है कि मोदी सरकार ने दक्षिण एशिया के लिए नई नीति बनाई है। इसमें पड़ोसी देशों के साथ बराबरी का बर्ताव कर उन्हें अपने साथ लेना और आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करना है। भारत से छिटक गए बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, मॉरीशस और मालदीव पिछले एक साल में उसके ज्यादा करीब आए हैं। ये मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी कामयाबी मानी जा सकती है।